BharatKosha
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 1009 of 1063

Read in context
Page 1009

हे स्तोताओ! तुम इंद्र का पूजन श्रेष्ठ रीति से करो. अपने शत्रुओं का नाश करने के लिए तुम इंद्र का पूजन करो. (५) अव स्वराति गर्गरो गोधा परि सनिष्पणत्. पिङ्गा परि चनिष्कददिन्द्राय ब्रह्मोद्यतम्.. (६) जब हमारे मंत्र इंद्र के प्रति गमन करते हैं तो कलश शब्द करता है. उस समय पीले रंग का पदार्थ गमन करता हुआ धनुष की प्रत्यंचा के समान शब्द करता है. (६) आ यत् पतन्त्येन्यः सुदुघा अनपस्फुरः. अपस्फुरं गृभायत सोममिन्द्राय पातवे.. (७) हे स्तोताओ! श्वेत वर्ण की जो गाएं हैं, उन में स्थित अविनाशी पदार्थ को ग्रहण करते हुए इंद्र के पीने के लिए सोमरस लाओ. (७) अपादिन्द्रो अपादग्निर्विश्वे देवा अमत्सत. वरुण इदिह क्षयत् तमापो अभ्यनूषत वत्सं संशिश्वरीरिव.. (८) इस पदार्थ को अग्नि, इंद्र ने तथा विश्वे देवों ने पी लिया है. हे जलो! संशिश्वरी के पुत्र के समान वरुण की स्तुति करो. (८) सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्त सिन्धवः. अनुक्षरन्ति काकुदं सूम्यं सुषिरामिव.. (९) हे वरुण! तुम्हारे पास सात नदियां हैं. जिस प्रकार जल नगर के बाहर निकलता हैं. उसी प्रकार तुम इन सात नदियों से जल प्रवाहित करो. (९) यो व्यतीँरफाणयत् सुयुक्ताँ उप दाशुषे. तक्वो नेता तदिद् वपुरुपमा यो अमुच्यत.. (१०) हवि दाता के लिए जो नेता उत्तम युक्तियों का प्रयोग करते हैं, उन की उपमा उन का शरीर ही है. तात्पर्य यह है कि कोई अन्य उन के समान नहीं है. (१०) अतीदु शक्र ओहत इन्द्रो विश्वा अति द्विषः. भिनत् कनीन ओदनं पच्यमानं परो गिरा.. (११) भार को संभालने वाले इंद्र सभी शत्रुओं को वश में करते हैं. मंत्र से पकते हुए ओदन को कठिन होते हुए भी उन्होंने उस का भेदन किया. (११) अर्भको न कुमारको ऽ धि तिष्ठन्नवं रथम्. स पक्षन्महिषं मृगं पित्रे मात्रे विभुकृतम्.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*