अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextनहीं सकता. (१८) अषाळ्हमुग्रं पृतनासु सासहिं यस्मिन् महीरुरुज्रयः. सं धेनवो जायमाने अनोनवुर्द्यावः क्षमो अनोनवुः.. (१९) वे प्रचंड इंद्र विशाल आश्रय के मार्ग वाले, वाणियों के द्वारा स्तुति प्राप्त तथा सेनाओं के द्वारा असहनीय हैं. आकाश और पृथ्वीलोक उन की स्तुति करते हैं. (१९) यद् द्याव इन्द्र ते शतं शतं भूमिरुत स्युः. न त्वा वज्रिन्तसहस्रं सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी.. (२०) हे इंद्र! आकाश और पृथ्वी सौसौ हों अथवा हजारों सूर्य और आकाश बन जाएं, तब भी वे तुम्हारी समानता करने में समर्थ नहीं हैं. (२०) आ पप्राथ महिना वृष्ण्या वृषन् विश्वा शविष्ठ शवसा. अस्माँ अव मघवन् गोमति व्रजे वज्रिंश्चित्राभिरूतिभिः.. (२१) हे इंद्र! हमारी गोचर भूमि में अपने रक्षा साधनों से हमें रक्षित करते हुए हमारी वृद्धि करो. (२१) सूक्त-९३ देवता—इंद्र उत् त्वा मन्दन्तु स्तोमाः कृणुष्व राधो अद्रिवः. अव ब्रह्मद्विषो जहि.. (१) हे वज्रधारी इंद्र! यह स्तुति तुम्हें प्रसन्न करने वाली हो. तुम ब्रह्मद्वेषियों को नष्ट करो तथा हमें धन दो. (१) पदा पर्णींरराधसो नि बाधस्व महाँ असि. नहि त्वा कश्चन प्रति.. (२) हे इंद्र! तुम पणियों का धन छीन लो और उन्हें मार दो. तुम महान हो. कोई भी तुम से प्रतिस्पर्धा कर के तुम्हारे सामने नहीं ठहर सकता. (२) त्वमीशिषे सुतानामिन्द्र त्वमसुतानाम्. त्वं राजा जनानाम्.. (३) हे इंद्र! तुम संस्कारित सोमरस एवं मनुष्यों के स्वामी हो. (३) ईङ्खयन्तीरपस्युव इन्द्रं जातमुपासते. भेजानासः सुवीर्यम्.. (४) जल की कामना करती हुई तथा श्रेष्ठ वीर्य से भरी हुई ओषधियां उत्पन्न होते ही इंद्र की इच्छा करती हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*