अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयह रोग तेरे गर्भाशय में फैल रहा है. (११) यस्ते गर्भममीवा दुर्णामा योनिमाशये. अग्निष्टं ब्रह्मणा सह निष्क्रव्यादमनीनशत्.. (१२) जो दुष्ट रोग तेरे गर्भाशय में व्याप्त हो रहा है, उसे अग्नि देव मंत्र के बल से नष्ट करें. (१२) यस्ते हन्ति पतयन्तं निषत्स्नं यः सरीसृपम्. जातं यस्ते जिघांसति तमितो नाशयामसि.. (१३) जो तेरे गिरते हुए अथवा निकलते हुए गर्भ को नष्ट करने की इच्छा करता है, हम उसे नष्ट करते हैं. (१३) यस्त ऊरु विहरत्यन्तरा दम्पती शये. योनिं यो अन्तरारेळ्हि तमितो नाशयामसि.. (१४) जो रोग तुम पतिपत्नी में व्याप्त है, जो तेरी योनि में तथा तेरी जंघाओं में व्याप्त है, हम उसे दूर करते हैं. (१४) यस्त्वा भ्राता पतिर्भूत्वा जारो भूत्वा निपद्यते. प्रजां यस्ते जिघांसति तमितो नाशयामसि.. (१५) जो पिशाच पति, उपपति अथवा भाई बन कर आता हुआ तेरे गर्भ में स्थित शिशु को नष्ट करना चाहता है, हम उसे मारते हैं. (१५) यस्त्वा स्वप्नेन तमसा मोहयित्वा निपद्यते. प्रजां यस्ते जिघांसति तमितो नाशयामसि.. (१६) जो तेरे स्वप्न रूप अंधकार में व्याप्त हो कर तेरी संतान का नाश करना चाहता है, उसे हम नष्ट करते हैं. (१६) अक्षीभ्यां ते नासिकाभ्यां कर्णाभ्यां छुबुकादधि. यक्ष्मं शीर्षण्यं मस्तिष्काज्जिह्वाया वि वृहामि ते.. (१७) मैं तेरे नेत्रों, नासिका, कानों, ठुड्डी आदि से शीर्षण्य रोग को तथा तेरे मस्तक और जीभ से यक्ष्मा आदि रोगों को बाहर करता हूं. (१७) ग्रीवाभ्यस्त उष्णिहाभ्यः कीकसाभ्यो अनूक्यात. यक्ष्मं दोषण्य १ मंसाभ्यां बाहुभ्यां वि वृहामि ते.. (१८) ebook converter DEMO Watermarks*