अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextदेवता तुम्हारी स्तुति करते हैं. (१) अस्येदिन्द्रो वावृधे वृष्ण्यं शवो मदे सुतस्य विष्णवि. अद्या तमस्य महिमानमायवो ऽ नु ष्टुवन्ति पूर्वथा.. (२) तैयार किए हुए सोम रस के द्वारा हर्ष प्राप्त होने पर वे इंद्र यजमान के धन और बल की वृद्धि करते हैं. स्तुति करने वाले ये जन उन इंद्र की महिमा को ही पहले के समान गाते हैं. (२) सूक्त-१०० देवता—इंद्र अधा हीन्द्र गिर्वण उप त्वा कामान् महः ससृज्महे. उदेव यन्त उदभिः.. (१) हे इंद्र! जिस प्रकार जल की कामना करते हुए मनुष्य जल में जल को मिलाते हैं, उसी प्रकार तुम्हारी कामना करने वाले मनुष्य तुम्हें सोम रूपी जलों से मिलाते हैं. (१) वार्ण त्वा यव्याभिर्वधंन्ति शूर ब्रह्माणि. वावृध्वांसं चिदद्रिवो दिवेदिवे.. (२) हे वज्रधारी इंद्र! तुम प्रत्येक स्तुति पर अपनी वृद्धि की कामना करते हो, इसलिए ये मंत्र तुम्हें जल की भांति वृद्धियुक्त बनाते हैं. (२) युञ्जन्ति हरी इषिरस्य गाथयोरौ रथ उरुयुगे. इन्द्रवाहा वचोयुजा.. (३) युद्ध के लिए प्रस्थान करने वाले इंद्र के यशोगान संबंधी मंत्रों से रथ में जुड़ने वाले इंद्र के घोड़े रथ में जुड़ते हैं. (३) सूक्त-१०१ देवता—अग्नि अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्. अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्.. (१) मैं सब के ज्ञाता, होता और यज्ञों को उत्तम बनाने वाले अग्नि का वरण करता हूं. (१) अग्निर्माग्न हवीमभिः सदा हवन्त विशपतिम्. हव्यवाहं पुरुप्रियम्.. (२) हव्यवाहक, बहुतों के प्रिय तथा प्रजापति अग्नि को यजमान हवि प्रदान करते हैं. इस कारण हम भी अग्नि को हवि देते हैं. (२) अग्ने देवाँ इहा वह जज्ञानो वृक्तबर्हिषे. असि होता न ईड्यः.. (३) हे अग्नि! ऋत्विज् के हेतु प्रदीप्त होते हुए तुम हमारे होता हो, इसलिए तुम देवों को ebook converter DEMO Watermarks*