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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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यदल्पिकास्वल्पिका कर्कन्धूकेवषद्यते. वासन्तिकमिव तेजनं यन्त्यवाताय वित्पति.. (३) जो कर्कन्धू अर्थात् बेरी के समान घर को नष्ट करने वाले तथा अल्प से भी अल्प कण प्राप्त होते हैं, तब वासंतिक तेज आधान के निमित्त उस में गमन करते हैं. (३) यद् देवासो ललामगुं प्रविष्टिमिनमाविषुः. सकुला देदिश्यते नारी सत्यस्याक्षिभुवो यथा.. (४) जब सुंदर गौ में प्रविष्ट देवता हर्षित होते हैं, तब नारी आंखों देखी के समान सत्य से युक्त हो जाती है. (४) महानग्न्य तृप्रद्धि मोक्रददस्थानासरन्. शक्तिकानना स्वचमशकं सक्तु पद्यम.. (५) महान अग्नि ऊपर खड़े हुए जनों पर आक्रमण न करते हुए तृप्ति प्राप्त करते हैं. हम तेजस्वी जनों को शक्ति प्राप्त हो. (५) महानग्न्यु लूखलमतिक्रामन्त्यब्रवीत्. यथा तव वनस्पते निरघ्नन्ति तथैवति.. (६) महान अग्नि उलूखल को लांघते हुए कहने लगे—हे बृहस्पति! लोग जिस प्रकार तुझे कूटते हैं, वैसा होना चाहिए. (६) महानग्न्युप ब्रूते भ्रष्टो ऽ थाप्यभूभुवः. तथैव ते वनस्पते पिप्पति तथैवति.. (७) महान अग्नि ने कहा—तू मिट कर भी बारबार उत्पन्न होती है. हे वनस्पति! जिस भांति तू पूर्ण होती है, वैसा ही होना चाहिए. (७) महानग्न्युप ब्रूते भ्रष्टोऽथाप्यभूभुवः. यथा वयो विदाह्य स्वर्गे नमवदह्यते.. (८) महान अग्नि ने कहा—तू नष्ट हो कर भी उत्पन्न हो जाती है. जीर्ण अवस्था में होने पर भी स्वर्ग में तेरा दोहन हवि के समान किया जाता है. (८) महानग्न्युप ब्रूते स्वसावेशितं पसः. इत्थं फलस्य वृक्षस्य शूर्पे शूर्पं भजेमहि.. (९) महान अग्नि का कथन है कि यह पापनाशक ओषधि भलीभांति उत्तेजित की गई है. हम फल वाले वृक्ष के सूपों में सूप को प्रविष्ट करते हैं. (९) ebook converter DEMO Watermarks*