अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 297 of 1063
Read in contextऔर पृथ्वी के मध्य में वर्तमान अंतरिक्ष हमारे लिए अभय करे. हमारे द्वारा सप्त ऋषियों को दिया जाता हुआ हवि हमें अभय देने वाला हो. (१) अस्मै ग्रामाय प्रदिशश्चतस्र ऊर्जं सुभूतं स्वस्ति सविता नः कृणोतु. अशत्र्विन्द्रो अभयं नः कृणोत्वन्यत्र राज्ञामभि यातु मन्युः.. (२) सूर्य देव हमारे निवास के गांव में और उस की चारों दिशाओं में अन्न उत्पन्न करें एवं कुशल प्रदान करें. हमारे मित्र इंद्र हमें अभय प्रदान करें तथा राजा का क्रोध हमें त्याग कर हम से दूर चला जाए. (२) अनमित्रं नो अधरादनमित्रं न उत्तरात्. इन्द्रानमित्रं नः पश्चादनमित्रं पुरस्कृधि.. (३) हे इंद्र! हमारी दक्षिण दिशा को शत्रुरहित करो. हमारी उत्तर दिशा को शत्रुविहीन बनाओ. हमारी पश्चिम और पूर्व दिशाओं को भी शत्रुहीन बनाओ. (३) सूक्त-४१ देवता—मन मनसे चेतसे धिय आकूतय उत चित्तये. मत्यै श्रुताय चक्षसे विधेम हविषा वयम्.. (१) हे पुरुष! सुख का अनुभव कराने वाले मन के लिए, ज्ञान के साधन चित्त के लिए, ध्यान के साधन बुद्धि के लिए, स्मृति के साधन संकल्प के लिए, ज्ञान के साधन चेतना के लिए, अतीत की स्मृति के कारण मति के लिए, सुनने से उत्पन्न ज्ञान के लिए एवं चक्षु से उत्पन्न ज्ञान के लिए हम आज्य से सेवा करते हैं. (१) अपानाय व्यानाय प्राणाय भूरिधायसे. सरस्वत्या उरुव्यचे विधेम हविषा वयम्.. (२) अपान वायु को, व्यान वायु को, प्राण वायु को, प्राणापान व्यान वायुओं को धारण करने वाले प्राणियों की, अत्यधिक व्याप्ति वाली सरस्वती की हम आज्य आदि के द्वारा सेवा करते हैं. (२) मा नो हासिषुर्ऋषयो दैव्या ये तनूपा ये नस्तन्वस्तनूजाः. अमर्त्या मर्त्याँभि नः सचध्वमायुर्धत्त प्रतरं जीवसे नः.. (३) प्राण के अधिष्ठाता देव एवं दिव्य गुणों वाले सप्त ऋषि हमें नहीं त्यागें. शरीरों के रक्षक ऋषि हमें सभी ओर से प्राप्त हों. वे हमें जीवन के लिए अत्यधिक आयु प्रदान करें. (३) सूक्त-४२ देवता—मन्यु ebook converter DEMO Watermarks*