अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयस्ते ऽ ङ्कुशो वसुदानो बृहन्निन्द्र हिरण्ययः. तेना जनीयते जायां मह्यं धेहि शचीपते.. (३) हे इंद्र! तुम्हारा जो हाथ आकर्षक धन धारण करने वाला एवं स्वर्ण से युक्त हैं. हे शची के पति! उसी हाथ से पत्नी के इच्छुक मुझ को पत्नी प्रदान करो. (३) सूक्त-८३ देवता—सूर्योदय अपचितः प्र पतत सुपर्णो वसतेरिव. सूर्यः कृणोतु भेषजं चन्द्रमा वो ऽ पोच्छतु.. (१) हे गंडमालाओ! जिस प्रकार बाज पक्षी अपने निवास स्थान से उड़ता है, उसी प्रकार तुम मेरे शरीर से निकल जाओ. सूर्य मेरी चिकित्सा करें और चंद्रमा मेरे शरीर से तुम्हें दूर करें. (१) अन्यैका श्येन्येका कृष्णैका रोहिणी द्वे. सर्वासामग्रभं नामावीरघ्नीरपेतन.. (२) एक गंडमाला लाल रंग की, दूसरी श्वेत वर्ण की तथा तीसरी काले रंग की है. इन के अतिरिक्त दो गंडमालाएं लाल रंग की हैं. मैं इन सब को प्रसन्न करने वाले नाम का उच्चारण करता हूं. इस से प्रसन्न हो कर तुम इस पुरुष को त्याग कर अन्यत्र चली जाओ. (२) असूतिकारामण्यपचित् प्र पतिष्यति. ग्लौरितः प्र पतिष्यति स गलुन्तो नशिष्यति.. (३) पीब बहाने वाली तथा घाव के रूप वाली गंडमाला इस पुरुष के शरीर से दूर जाएगी. इस के घाव के कारण होने वाला दुःख नष्ट हो जाएगा तथा चंद्रमा गंडमालाओं की पीड़ा को शेष नहीं रखेगा. (३) वीहि स्वामाहुतिं जुषाणो मनसा स्वाहा मनसा यदिदं जुहोमि.. (४) हे घाव रोग के अभिमानी देव! तुम अपनी आहुति का भक्षण करो. सेवा किए जाते हुए तुम आहुति का भक्षण करो. मैं भी मन से यह हवि देता हूं. (४) सूक्त-८४ देवता—निर्ऋति यस्यास्त आसनि घोरे जुहोम्येषां बद्धानामवसर्जनाय कम्. भूमिरिति त्वाभिप्रमन्वते जना निर्ऋतिरिति त्वाहं परि वेद सर्वतः.. (१) हे रोगाभिमानिनी पाप की देवी! घाव के रोगों से उत्पन्न बंधनों से छूटने के लिए मैं ebook converter DEMO Watermarks*