अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextत्यूम् षु वाजिनं देवजूतं सहोवानं तरुतारं रथानाम्. अरिष्टनेमिं पृतनाजिमाशुं स्वस्तये तार्क्ष्यमिहा हुवेम.. (१) हम यज्ञकर्म की पूर्ति के निमित्त गरुड़ का आह्वान करते हैं. वह बलशाली, देवों के द्वारा सोम लाने हेतु प्रेरित तथा सब को पराजित करने वाले हैं. उन के रथ पर कोई आक्रमण नहीं कर सकता. वह संग्राम में शत्रुओं को नष्ट करने वाले हैं. गरुड़ शत्रु सेनाओं के विजेता एवं शीघ्रगामी है. (१) सूक्त-९१ देवता—इंद्र त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रं हवेहवे सुहवं शूरमिन्द्रम्. हुवे नु शक्रं पुरुहूतमिन्द्रं स्वस्ति न इन्द्रो मघवान् कृणोतु.. (१) हम त्राण एवं रक्षा करने वाले इंद्र का आह्वान करते हैं. हम अपने आह्वानाें के द्वारा शूर इंद्र को बुलाते हैं. हम शक्तिशाली एवं पुरुहूत इंद्र को बुलाते हैं. शक्तिशाली इंद्र हमें स्वास्थ्य प्रदान करें. (१) सूक्त-९२ देवता—इंद्र यो अग्नौ रुद्रो यो अप्सव १ न्तर्य ओषधीर्वीरुध आविवेश. य इमा विश्वा भुवनानि चाक्लृपे तस्मै रुद्राय नमो अस्त्वग्नये.. (१) जो रुद्रदेव यज्ञ करने योग्य होने के कारण अग्नि में प्रवेश कर गए हैं तथा जिन्होंने वरुण के रूप में जलों में प्रवेश किया है, जिन्होंने वृक्षों, लताओं और जड़ीबूटियों में स्थान प्राप्त किया है, रुद्र इन सभी प्राणियों का निर्माण करने में समर्थ हुए हैं, उन अग्नि रूप रुद्र को नमस्कार है. (१) सूक्त-९३ देवता—सर्पविष का विनाश अपेह्यरिरस्यरिर्वा असि. विषे विषमपृक्था विषमिव् वा अपृक्था:. अहिमेवाभ्यपेहि तं जहि.. (१) हे सर्पविष! तू इस डसे हुए पुरुष के शरीर से दूर चला जा, क्योंकि तू शत्रु है. तू केवल इस का ही नहीं, सभी मनुष्यों का शत्रु है, इसीलिए तू विषैले सर्प में ही अपना विष संयुक्त कर. तू अपना विषैला प्रभाव ही संयुक्त कर. हे विष! तू जिस सर्प का है, उसी के समीप जा तथा उसी का विनाश कर. (१) सूक्त-९४ देवता—अग्नि eBook converter DEMO Watermarks*