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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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भुजिष्यं १ पात्रं निहितं गुहा यदाविर्भोगे अभवन्मातृमद्भ्यः.. (६०) विश्वकर्मा ने हवि द्वारा पृथ्वी को राक्षसों के चक्कर से निकालने की इच्छा की थी. तब गुप्त रहने वाला भुजिष्य पात्र अर्थात् अन्न उपभोग के सामान दिखाई पड़ने लगा. (६०) त्वमस्यावपनी जनानामदितिः कामदुघा पप्रथाना. यत् त ऊनं तत् त आ पूरयाति प्रजापतिः प्रथमजा ऋतस्य.. (६१) हे पृथ्वी! तुम कामनाओं को पूर्ण करने वाली हो. तुम इस विश्व की क्षेत्र रूपी विस्तार वाली हो. तुम्हारे कम होने वाले भाग को प्रजापति पूरा करते हैं. (६१) उपस्थास्ते अनमीवा अयक्ष्मा अस्मभ्यं सन्तु पृथिवि प्रसूताः. दीर्घं न आयुः प्रतिबुध्यमाना वयं तुभ्यं बलिहृतः स्याम.. (६२) हे पृथ्वी! तुम में रहने वाले हमारे लोग यक्ष्मा रोग रहित रहें. हम अपनी दीर्घ आयु से युक्त हो कर तुम्हें हवि देने वाले बनें. (६२) भूमे मातर्नि धेहि मा भद्रया सुप्रतिष्ठितम्. संविदाना दिवा कवे श्रियां मा धेहि भूत्याम्.. (६३) हे पृथ्वी माता! मुझे मंगलमय प्रतिष्ठा प्रदान करो. हे विश! मुझे लक्ष्मी और विभूति में स्थित रखती हुई स्वर्ग प्रदान कराओ. (६३) सूक्त-२ देवता—अग्नि तथा मृत्यु नडमा रोह न ते अत्र लोक इदं सीसं भागधेयं त एहि. यो गोषु यक्ष्मः पुरुषेषु यक्ष्मस्तेन त्वं साकमधराङ् परेहि.. (१) हे क्रव्याद अग्नि! तू नड अर्थात् सरकंडे पर आरोहण कर. जो यक्ष्मा रोग मनुष्यों में अथवा जो यक्ष्मा गौ में है, तू उस के साथ यहां से दूर चली जा. तू अपने भाग्य की सीमा पर आ. (१) अघशंसदुःशंसाभ्यां करेणानुकरेण च. यक्ष्मं च सर्वं तेनेतो मृत्युं च निरजामसि.. (२) पाप और दुर्भावनाओं का नाश करने वाले कर तथा अनुकर से मैं यक्ष्मा रोग को पृथक् करता हूं. मैं मृत्यु को भी दूर भगाता हूं. (२) निरितो मृत्युं निर्ऋतिं निररातिमजामसि. यो नो द्वेष्टि तमद्ध्यग्ने अक्रव्याद् यमु द्विष्मस्तमु ते प्र सुवामसि.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*