आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
Page 10 of 235
Read in context७
इसके बाद संस्कारकर्ताओं का समय आया । संस्कारकर्ताओं ने यद्यपि प्रधान रूप से अग्निवेश और सुश्रुत तंत्रों का संहिता करण किया तथापि वे उनका स्वरूप यथा पूर्व न रख सके । इसके अनेक कारण हैं जिनका कि कुछ परिचय आयुर्वेद दर्शन को पढ़ते र भी होसकता है । चरक संहिता में नवद्व्यवाद का और सुश्रुत संहिता में आत्मा को असर्वगत कहने वाले अंश का दिखाई देना यह सूचित करता है कि इनमें अन्यत्र के अंशों का भी संग्रह किया गया । संस्कारकर्ता यदि तपूर्व कालीन सृष्टिविज्ञानों पर उनके परस्पर विरोध पर और इस विरोध के कारण जो घटनाएँ घटी उनपर ऐतिहासिक दृष्ट्या अधिक विचार करते तो उनके द्वारा दार्शनिक अंशों का अव्यवस्थित संग्रह न होता । संभव है कि सामाजिक परिस्थिति ने उनको ऐसा न करने दिया हो ।
इस समय आयुर्वेद दर्शन के विषय में भिन्न-भिन्न मत प्रगट किये जा रहे हैं । किंतु उक्त घटनाओं पर ध्यान दिया जाय तो अव्यवस्थित बिखरे हुए दार्शनिक अंशों की व्यवस्थित संगति लभ्य जाती है और फिर मत भेद भी नहीं रहता । इस आयुर्वेद दर्शन में उसके दार्शनिक अंशों की यथामति संगति लगाकर ही उसके सर्व सम्मत सिद्धान्त को जानने का यत्न किया गया है । अतः जनता रूपी जनार्दन से सविनय प्रार्थना है कि वह इसे एक बार अपनोले ।
कई सज्जनों ने इसके पहिले ही इस विषय पर अपने विचार प्रगट किये हैं । उन विचारों में और इस आयुर्वेद दर्शन में प्रगट किये गये विचारों में अन्तर पड़ जाना स्वाभाविक है । फिर भी वे एक तो