आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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त्मक सत्त्व में परिणत होता है। इस सत्त्व के ही अवस्था विशेष मन व बुद्धि हैं। इसका तत्त्व संख्यान भी चतुर्विंशतिक अथवा पंचविंशतिक नहीं है। इस सिद्धांत के सात तत्त्व हैं; आत्मा, सत्त्व, रज, तम, वायु, अग्नि, और सोम। इन को प्राण भी कहते हैं। इस त्रिभागात्मक सिद्धांत का अधिक परिचय तो ‘आयुर्वेद दर्शन के’ पठने के बाद ही होगा। प्रस्तुत में हम इतना ही व्यक्त करना चाहते हैं कि आयुर्वेद का यह सिद्धांत अपने ढंग का निराला है।
अनुमान है कि इस सिद्धांत का अविकल रूप अग्निवेश और सुश्रुत के समय में तथा आगे भी कुछ पीढ़ियों तक रहा होगा। अथवा यूँ कह सकते हैं कि अग्निवेश और सुश्रुतकृत तंत्र जबतक अलंढित विद्यमान थे तबतक आयुर्वेद दर्शन भी व्यवस्थित रूप में था। किंतु जब इन तंत्रों के पत्रे बिखरने लगे तब उसकी भी दुर्दशा हुई।
यह ऐतिहासिक सत्य है कि यज्ञः पुरुषीय परिषद में जिस सत्त्ववाद और आत्मवाद का उल्लेख है उनको तदुत्तर काल में कापिल संख्य और वेदांत का रूप प्राप्त हुआ। इनके अतिरिक्त उस नव द्रव्यवाद का भी उत्थान हुआ जिसकी सामग्री यज्ञः पुरुषीय सृष्टिविज्ञानों से ही इकट्ठा की गई थी। ये शब्दादिकों को कारण गुण मानते थे और आयुर्वेद दर्शन के साथ इनका इस विषय में ही गहरा मत भेद था। एक ओर इनका प्रचार बढ़ रहा था तो दूसरी ओर आयुर्वेद के पत्रे बिखर रहे थे। यह तो स्पष्ट ही है कि इस दुरवस्था की तह में आयुर्वेद की अमृतमयी चिकित्सा नहीं थी बल्कि इन संप्रदायों के बुद्धिवाद को अस्वीकृत करने वाला उसका सृष्टि-विज्ञान था। और यह दुरवस्था सदियों तक होती रही।