आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
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त्मक सत्त्व में परिणत होता है। इस सत्त्व के ही अवस्था विशेष मन व बुद्धि हैं। इसका तत्त्व संख्यान भी चतुर्विंशतिक अथवा पंचविंशतिक नहीं है। इस सिद्धांत के सात तत्त्व हैं; आत्मा, सत्त्व, रज, तम, वायु, अग्नि, और सोम। इन को प्राण भी कहते हैं। इस त्रिभागात्मक सिद्धांत का अधिक परिचय तो ‘आयुर्वेद दर्शन के’ पठने के बाद ही होगा। प्रस्तुत में हम इतना ही व्यक्त करना चाहते हैं कि आयुर्वेद का यह सिद्धांत अपने ढंग का निराला है।
अनुमान है कि इस सिद्धांत का अविकल रूप अग्निवेश और सुश्रुत के समय में तथा आगे भी कुछ पीढ़ियों तक रहा होगा। अथवा यूँ कह सकते हैं कि अग्निवेश और सुश्रुतकृत तंत्र जबतक अलंढित विद्यमान थे तबतक आयुर्वेद दर्शन भी व्यवस्थित रूप में था। किंतु जब इन तंत्रों के पत्रे बिखरने लगे तब उसकी भी दुर्दशा हुई।
यह ऐतिहासिक सत्य है कि यज्ञः पुरुषीय परिषद में जिस सत्त्ववाद और आत्मवाद का उल्लेख है उनको तदुत्तर काल में कापिल संख्य और वेदांत का रूप प्राप्त हुआ। इनके अतिरिक्त उस नव द्रव्यवाद का भी उत्थान हुआ जिसकी सामग्री यज्ञः पुरुषीय सृष्टिविज्ञानों से ही इकट्ठा की गई थी। ये शब्दादिकों को कारण गुण मानते थे और आयुर्वेद दर्शन के साथ इनका इस विषय में ही गहरा मत भेद था। एक ओर इनका प्रचार बढ़ रहा था तो दूसरी ओर आयुर्वेद के पत्रे बिखर रहे थे। यह तो स्पष्ट ही है कि इस दुरवस्था की तह में आयुर्वेद की अमृतमयी चिकित्सा नहीं थी बल्कि इन संप्रदायों के बुद्धिवाद को अस्वीकृत करने वाला उसका सृष्टि-विज्ञान था। और यह दुरवस्था सदियों तक होती रही।
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इसके बाद संस्कारकर्ताओं का समय आया । संस्कारकर्ताओं ने यद्यपि प्रधान रूप से अग्निवेश और सुश्रुत तंत्रों का संहिता करण किया तथापि वे उनका स्वरूप यथा पूर्व न रख सके । इसके अनेक कारण हैं जिनका कि कुछ परिचय आयुर्वेद दर्शन को पढ़ते र भी होसकता है । चरक संहिता में नवद्व्यवाद का और सुश्रुत संहिता में आत्मा को असर्वगत कहने वाले अंश का दिखाई देना यह सूचित करता है कि इनमें अन्यत्र के अंशों का भी संग्रह किया गया । संस्कारकर्ता यदि तपूर्व कालीन सृष्टिविज्ञानों पर उनके परस्पर विरोध पर और इस विरोध के कारण जो घटनाएँ घटी उनपर ऐतिहासिक दृष्ट्या अधिक विचार करते तो उनके द्वारा दार्शनिक अंशों का अव्यवस्थित संग्रह न होता । संभव है कि सामाजिक परिस्थिति ने उनको ऐसा न करने दिया हो ।
इस समय आयुर्वेद दर्शन के विषय में भिन्न-भिन्न मत प्रगट किये जा रहे हैं । किंतु उक्त घटनाओं पर ध्यान दिया जाय तो अव्यवस्थित बिखरे हुए दार्शनिक अंशों की व्यवस्थित संगति लभ्य जाती है और फिर मत भेद भी नहीं रहता । इस आयुर्वेद दर्शन में उसके दार्शनिक अंशों की यथामति संगति लगाकर ही उसके सर्व सम्मत सिद्धान्त को जानने का यत्न किया गया है । अतः जनता रूपी जनार्दन से सविनय प्रार्थना है कि वह इसे एक बार अपनोले ।
कई सज्जनों ने इसके पहिले ही इस विषय पर अपने विचार प्रगट किये हैं । उन विचारों में और इस आयुर्वेद दर्शन में प्रगट किये गये विचारों में अन्तर पड़ जाना स्वाभाविक है । फिर भी वे एक तो
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पावित्र हृदय से प्रगट किये गये हैं दूसरे वे इसके पहिले प्रगट किये गये हैं अतः उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना हमारा कर्तव्य है । सिवाय उनके प्रति भी हम कृतज्ञ हैं जिन्होंने समय २ पर अपनी बहुमूल्य सम्पत्ति और सहायता प्रदान की । प्रेस के कर्मचारियों ने जिस सहृदयित्व से काम किया उसके लिये वे हार्दिक श्रुत्यवाद के पात्र हैं । भाषा विषयक बुटियों को तज्ञ इसलिये क्षमा करेंगे कि एक महाराष्ट्रीय के द्वारा की गई हिन्दी वाग्देवता की यह प्रेममयी पूजा है ।
श्रिमती चैत्र श्रु. १ सोमवार वि० सं. १९९४ १२ अप्रैल १९३७.
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महादेव चन्द्रशेखर पाठक.
शुद्धिपत्र
| पृष्ठ | पंक्ति | अशुद्ध | शुद्ध |
|---|---|---|---|
| ७ | ४ | प्रजाप्रति | प्रजापति |
| ८ | १० | तदनंतर | तदनंतर |
| ८ | १० | काशिषति | काशिषति |
| १० | ६ | ह्यते | ह्यते |
| १५ | ३ | चेतस् | चेतस् |
| २० | १६ | यदार्थ | पदार्थ |
| ३० | १५ | कर्तृत्व | कर्तृत्व |
| ३३ | १२ | सदश | सहश |
| ३८ | ७ | भूमिपु | भूमिपु |
| ३८ | ८ | संख्येमकोत्तर | संख्येमकोत्तर |
| ३८ | ११ | चक्षेत | चक्षते |
| ३९ | २ | भूताना | भूतानां |
| ४० | १५ | वर्गकिरण | वर्गकिरण |
| ४२ | ७ | रसास्तावत् | रसास्तावत् |
| ४३ | ४ | भूषिष्टे | भूषिष्टे |
| ४३ | १८ | गुणनां | गुणानां |
| ४४ | १५ | ऽसमत् | ऽस्मात् |
| ४४ | २० | स्वचनुषुरः | स्वचनुचरः |
| ४८ | ७ | मधुर | मधुर |
२
| वृद्ध | पांक्ति | अशुद्ध | शुद्ध |
|---|---|---|---|
| ४९ | १४ | शारीरं धातु | शारीरं धातुओं |
| ५७ | १७ | दृष्ट्या | दृष्ट्या |
| ६२ | २० | भतपंचक | भूतपंचक |
| ७७ | ५ | उष्णसह्याः | उष्णसह्याः |
| ७७ | ८ | प्रभता | प्रभूता |
| ८३ | ४ | शीतात्माक | शीतात्मक |
| ८६ | १२ | यत्रेधरः | यंत्रधरः |
| ८९ | १३ | कांकायन थे | कांकायन |
| १०३ | ९ | पंच | पंच धातु |
| १०५ | १२ | मता | मतो |
| ११४ | १३ | मन का | मन को |
| १२४ | २ | ग्रजा | प्रजा |
| १२९ | ६ | सष्टि | सृष्टि |
| १३० | १६ | अकपित | अकुपित |
| १५२ | ११ | पित | पितु |
| १५३ | ६ | विनिर्णयम् | विनिर्णयम् |
| १६८ | ३ | साम | सोम |
| १६९ | १९ | घानष्ट | घनिष्ट |
| १७७ | २० | एषा | एषो |
| १७८ | १ | इसका | इसको |
| १८४ | २ | छीवनादि | छीवनादि |
| १८६ | १५ | गभा | गर्भौ |
| १८७ | २२ | आमशय | आमाशय |
३
| पृष्ठ | पंक्ति | अशुद्ध | शुद्ध |
|---|---|---|---|
| १९० | ९ | पत | पित्त |
| १९० | १८ | मुख | ( मुख |
| १९० | २१ | आभषवण • | अभिषवण |
| १९० | २३ | Enyzms | Enzyms |
| १९१ | १९ | पष्टिक | पैष्टिक |
| १९२ | १२ | रजंक | रजक |
| १९२ | १९ | अहट | अहण्ट |
| २०४ | १ | रक्ता | सिता, रक्ता. |
क्षोष अशुद्धियों को कृपया तर्क से शुद्ध कर लिया जाय ।
विषयानुक्रमणिका.
विषय प्रवेश.
| उद्देश व साधन | ... | १ |
|---|---|---|
| यज्ञःपुरुषीय परिषद् का काल | ... | २ |
| दार्शनिक संप्रदाय | ... | ३ |
| यज्ञःपुरुषीय परिषद् | ... | ७ |
| काशीपति ग्रामक का मुख्य खवाल व अध्यक्ष का प्रस्ताव | ... | ८ |
| परीक्षामौद्गल्य का आत्मवाद. | ... | १० |
|---|
| आत्मा का पुरुष-योगोत्पादकत्व | ... | १० |
|---|---|---|
| चौबीस तत्व और अन्यक सहित अष्टधातु प्रकृति... | ... | ११ |
| आत्मा के बोध्दत्व, कर्तृत्व और अस्तित्व के विषय में | ... | ११ |
| ज्ञातृत्व में कर्तृत्व का समन्वय | ... | १४ |
| अनादि पुरुष व समुदायात्मक पुरुष | ... | १५ |
| आत्मा के विभु और एक होने के विषय में | ... | १६ |
| आत्मा से ही बुध्दयादि सत्प्रातुओं की उत्पत्ति... | ... | १७ |
| सत्वादि गुण बाहुल्य से आशादिकों की उत्पत्ति | ... | १७ |
| तन्मात्राओं के विषय में मतभेद | ... | १८ |
| महाभूतों के गुण व लक्षण | ... | १९ |
| आत्मवादियों की कुछ विशेष बातें | ... | २० |
| इन्द्रियोत्पत्ति | ... | २० |
२
| इन्द्रियों में सत्व की वृत्तियाँ | ... | २६ |
|---|---|---|
| मन के अस्तित्व, स्वरूप और कार्य के विषय में | ... | २१ |
| बुद्धि के प्रकार | ... | २४ |
| आत्मवाद का उपसंहार | ... | २४ |
| शरलोभा का सख वाद | ... | |
| आत्मवादका प्रतिवाद सत्त्वेके पुरुष रोगो त्यादकत्वका समर्थन | २६ | |
| सत्ववाद में आत्मा का औदासिन्य | ... | २६ |
| सत्ववाद का सौश्रुतिक प्रकृति पुरुष वाद से संबंध... | ... | २६ |
| सौश्रुतिक प्रकृतिपुरुषवाद और उसकी विशेषताएँ... | ... | २७ |
| आत्मा को असर्वगत कहनेवालों का मतभेद | ... | ३२ |
| वायोंविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत | ... | ३४ |
| सत्ववाद का प्रतिवाद | ... | ३४ |
| रस के पुरुष-रोगोत्यादकत्व का समर्थन | ... | ३६ |
| वैदिक रस अथवा सोम | ... | ३६ |
| अगीषोम लोकपक्षियों की और वायोंविद् की दृष्टि में | ||
| रस का घर्मात्मकत्व | ... | ३७ |
| रस के विषय में पंचात्मक लोकपक्षियों का मत | ... | ३७ |
| रस जन्म सचेतन घटक और सचेतन घटकों का | ||
| भिन्न २ प्रकार से वर्गीकरण | ... | ३८ |
| सचेतन द्रव्यों के वर्गीकरण में षड् रस प्रयुक्त और | ||
| गुण प्रयुक्त मतभेद | ... | ४० |
| पंचात्मक लोकपक्षियों की द्रव्यप्रधानता | ... | ४५ |
| त्रिधातु सिद्धांत का आरंभ | ... | ४६ |
३
| वातपित्त-क्षेप्माका ओं का इतिहास | ... | ४७ |
|---|---|---|
| पहिला वर्गीकरण | ... | ४९ |
| ओज, तेज व धातुप्रसाद | ... | ५१ |
| ओज तेज ऊष्मादिकों का क्षेप्मपित्तवातों में समन्वय | ... | ५९ |
| वासु के विषय में | ... | ६४ |
| दूसरा वर्गीकरण | ... | ६७ |
| वातपित्त-क्षेप्माओं की प्राकृत वैकृत अवस्थाएँ | ... | ६८ |
| अणु अवयवों के अथवा गर्भांकुर के रासायनिक संगठन में क्षेप्मपित्तवात | ... | ७० |
| दोष प्रकृति | ... | ७६ |
| वातादिकों का द्वैविध्य | ... | ८० |
| ब्रह्मादिगुण प्रधानता वादियों की पांचभौतिकी प्रकृति | ... | ८० |
| वातपित्त-क्षेप्माओं का लोकगत अधिष्ठान | ... | ८१ |
| अशीषोसवाद | ... | ८२ |
| वातकला कर्लीब परिषद | ... | ८५ |
| तीसरा वर्गीकरण | ... | ९० |
| हरिणयाक्ष कुशिक और षड्धातुवाद | ... | ९१ |
| रसवाद का प्रतिवाद | ... | ९१ |
| पुरुषरोगोत्पत्ति में षड्धातुओं का समर्थन | ... | ९१ |
| भारद्वाजीय गर्भावक्रांति का खंडन | ... | ९२ |
| षड्धातुवादियों का सामान्य सिद्धांत | ... | ९३ |
| चेतनाधातु | ... | ९३ |
४
गुणी चेतना धातु से आकाशादि गुणपंचक की उत्पत्ति ..... ९४
अभिव्यक्ति के समय आकाशादिकों का अप्रतीघातत्वादि मात्रत्व ..... ९६
गुर्वादि गुणों की प्रधानता ..... ९७
गुर्वादि गुणों और वातपित्त स्नेष्माओं का गुणपंचक में समन्वय ..... ९८
शब्द स्पर्शादि, ' कारण गुण ' नहीं है ..... ९८
सत्व का करणोपादानत्व और ज्ञातृत्व कर्तृत्व में जन्यजनकता का निषेध ..... ९९
मातृजादि भाव, महाभूत विकार हैं ..... ९९
इंद्रिय और इंद्रियार्थों का पांच भौतिकत्व ..... १००
षड्धातु वाद में कर्म को कृत मानते हैं ..... १०१
भद्रकाप्य का कर्मवाद ..... १०५
षड्धातुवाद का प्रतिवाद व कर्म के पुरुष रोगोत्पादकत्व का समर्थन ..... १०५
भद्रकाप्य के कर्मवाद में कर्म को 'अकृत' मानते हैं... १०५
प्रमाण चतुष्टय के द्वारा पुनर्भव की सिद्धि ..... १०६
गर्भावकांति में पुनर्भव ..... ११०
भद्रकाप्य का शब्दादि गुणप्रधान पंचात्मक लोकपक्षीयत्व १११
भारद्वाज का स्वभाववाद
कर्म का प्रतिवाद और स्वभाव का समर्थन ..... ११२
५
अप्रतीघातकत्वादि गुणों का 'अभूत' आकाशादिकों में | | ---|---|--- स्वभावतः अस्तित्व | ... | ११३ षड्रसों का धातुपंचक में समन्वय | ... | ११३ चेतना का अधिष्ठान अथवा चेतना, चैतस्, या मनका | | समवायिकारण | ... | ११३ गर्भोत्पादक भावों के प्रतिवाद में भारद्वाज का वक्तव्य | | ११५ दो पञ्चीकरण | ... | ११७ वातपित्तश्लेष्माओं के विषय में भारद्वाज की दृष्टि... | | ११९ गुर्वादि गुणप्रधानतावाद के आद्यप्रवर्तक भारद्वाज .... | | १२०
कांकायन का प्रजापतिवाद
| स्वभाव का प्रतिवाद और प्रजापतिवाद का समर्थन | १२१ | |
|---|---|---|
| वैदिक प्रजापतिवाद | ||
| प्रजापति की तीन ज्योतियाँ | ... | १२४ |
| वायु | .... | १२५ |
| अग्नि | .... | १३० |
| सोम | .... | १३२ |
| प्रजापति का संकल्प और ज्ञातृत्व तथा कर्तृत्व में | ||
| अन्योनानुविधायित्व | .... | १३६ |
| प्रजापतिवाद की अन्य बातें | .... | १३७ |
भिन्न आत्रेय का कालवाद
| प्रजापतिवाद और काल का समर्थन | ... | १३८ |
|---|---|---|
| ऋतुओं के उष्णशीतवर्षलक्षणों का जीवन से संबंध | .... | १३९ |
| संवत्सरात्मक काल के विभाग | ... | १३९ |
६
| काल का सूर्यचंद्रवायुओं में समन्वय | .... | १४० |
|---|---|---|
| ,, धातुपंचक में समन्वय | ... | १४१ |
| ,, अग्निषोम संज्ञक धर्मों में समन्वय | .... | १४२ |
| भिन्न अत्रिय के मत से काल अर्थात् विश्व | ||
| व्यापिनी गति | .... | १४३ |
| पुनर्वसु अत्रिय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत.... | १४५ | |
| पक्षराग त्याग और अध्यात्म चिंतन का उपदेश .... | १४५ | |
| भावों के संपद्विषय का पुरुषरोगोत्पादकत्व | .... | १४५ |
| भावों के विषय में | ... | १४६ |
| अध्यात्म चिंतन का हेतु | ... | १४६ |
| भारद्वाज के प्रति उत्तर | ... | १४७ |
| पक्षराग त्याग का हेतु | ... | १६१ |
| त्रिभागात्मक सिद्धांत | ... | १६२ |
| त्रिभागात्मक सिद्धांत का तात्त्विक स्वरूप | ... | १६२ |
| ज्ञातृत्व और कर्तृत्व में जन्यजनक संबंध नहीं है ... | ... | १६४ |
| अन्योऽन्यानुविधायित्व | ... | १६७ |
| अत्रिय की दृष्टि से पुरुषोत्पादक भाव | ... | १६८ |
| तंत्र की भाषा में पुरुष की अभिदृष्टि का कारण... | ... | १६८ |
| त्रिभागात्मक सिद्धांत को धान्वतरो की मान्यता | ,, | |
| त्रिभागात्मक सिद्धांतही आयुर्वेद का निष्णात | ||
| सृष्टिविज्ञान है. | ... | १७१ |
७
परिशिष्ट
| वातपित्त-क्षेग्माओं के प्रकार | ... | १७२ |
|---|---|---|
| वायु के प्रकार | ... | १७३ |
| पित्त के प्रकार | ... | १८७ |
| क्षेग्मा के प्रकार | ... | २०५ |
| सत्व के प्रकार | ... | २१० |
ग्रंथकर्ता
A black and white portrait photograph of a man with a white turban and a mustache, wearing a dark suit. The photo is framed by a thick black border.
वैद्य महादेव चंद्रशेखर पाठक
श्री.
आयुर्वेद-दर्शन.
विषय प्रवेश.
इस आयुर्वेद-दर्शन में मुख्यतः इस बात पर विचार करना है कि 'भगवान् पुनर्वसु आत्रेय के समय तक देह लोकरोगोत्पादक विशेषतः पुरुषरोगोत्पादक कारणों के विषय में आयुर्वेद में कितने भिन्न २ दार्शनिक संप्रदाय व उनके भिन्न २ मत प्रचलित थे और इनके विषय में अंतिम निर्णय क्या हुआ' ।
दार्शनिक दृष्ट्या पुरुष रोगोत्पादक कारणों का विचार करने वाले ऋषियों के नाम चरक संहिता के 'यज्ञः पुरुषीय,' 'आत्रेय भद्रा काष्पीय' और 'वातकलाकलीय' परिषदों के विवेचन में उल्लिखित हैं और उनके सांप्रदायिक बक्तव्यों के अंश उक्त परिषदों के अतिरिक्त भी सर्वत्र अभिवेश व आत्रेय के संवाद के रूप में उपलब्ध होते हैं । इनमें जो संप्रदाय वैदिक हैं उनका वैदिक मंत्रों में वर्णन है । सिवाय
२
आयुर्वेद-दर्शन
इन संप्रदायों से संबंध रखने वाले कतिपय अंश सुश्रुत-संहिता अष्टांगसंग्रह आदि तंत्रों में भी दिखाई देते हैं। चरकाचार्य नागाजुन आदि संस्कारकर्ताओं ने इन वचनों का इस कदर संहितीकरण किया है कि उसका विश्लेषण करके प्रत्येक संप्रदाय के भिन्न २ वक्तव्य को समुचित रूप से जानना कठिन है। फिर भी 'यज्ञः पुरुषीय परिषद्' के आधार पर उन अंशों को जानने का हम यथामति सत्साहस करते हैं।
यह मानना अधिक संतोषजनक है कि यज्ञः—पुरुषीय-परिषद् का आयोजन भारतीय युद्ध के पूर्व किसी समय हुआ। क्योंकि इस परिषद् में जो ऋषि उपस्थित थे उनमें से कतिपय के नाम ब्राह्मण ग्रंथों में उपलब्ध होते हैं। महाभारत के आदि पर्व में लिखित द्रोणाचार्य की जीवनी पर से यह ज्ञात होता है कि द्रोणाचार्य का अध्ययन कुलपति अग्निवेश के आश्रम में हुआ। उक्त अग्निवेश, यदि पुनर्वसु के पट्टशिष्य अग्निवेश ही हों तो यज्ञः—पुरुषीय-परिषद् का समय युद्धपूर्व ही होगा। पुनर्वसु आत्रेय जो कि इस परिषद् के अध्यक्ष थे; त्रेतायुग के अंत तक ही 'युगधर्म' का विवेचन (च. वि. अ. ३) करते हुए दिखाई देते हैं। इस पर से भी यह अनुमान किया जा सकता है कि उनके लिये द्वापर युग वर्तमान समय की घटना थी।
विवेच्य प्रवेश
३
इसके अतिरिक्त दो बातों का और भी विचार करना होगा। पहिली यह कि यज्ञः—पुरुषीय—परिषद् में जिन दार्शनिक संप्रदायों का उल्लेख है वे सांख्य-वेदांत-न्याय-योग-सूत्र प्रतिपादित दर्शनों से प्राचीन मालूम होते हैं। अर्थात् श्रीमद् व्यास के वेदांत सूत्रों की रचना यज्ञः—पुरुषीय—परिषद् के बाद हुई है। दूसरी यह कि यह परिषद् उस समय हुई जिस समय बाल्हीक देश में एक मात्र वैदिक संप्रदाय प्रचलित था।
यज्ञः—पुरुषीय—परिषद् में जिन दार्शनिक संप्रदायों का उल्लेख है उनके पूर्वोपपत्थ का निश्चय करना जितना गंभीर है उतना ही आवश्यक है। इस विषय में मैं उनसे सहमत हूँ जो कि यह प्रतिपादन करते हैं कि मानवीयज्ञान की अभिवृद्धि क्रमशः और स्वाभाविकरीत्या पैदा होने वाली आवश्यकताओं के अनुसार हुई है। इस तरह देखा जाय तो सर्व प्रथम आधिदैविक दार्शनिकों का तत्पश्चात् आधिभौतिक दार्शनिकों का और तत्पश्चात् आध्यात्मिक दार्शनिकों का अभ्युत्थान स्वीकार करना स्वाभाविक है। यज्ञः—पुरुषीय—परिषद् की चर्चा में यह क्रम दिखाई नहीं देता और यह कोई आवश्यक भी नहीं है कि सभा समितियों में अपने ऐतिहासिक पूर्वोपपत्थ के अनुसार ही आगे पीछे बोला जाय।
४
आयुर्वेद-दर्शन
किसी समय ( अथवा सर्व प्रथम ) आयुर्वेद में वह सृष्टि विज्ञान प्रचलित था जिसका आरंभ सूर्य, चंद्र और वायु इन प्रत्यक्ष जागतिक चमत्कारों अथवा देवताओं से होता है। इन पर टाँछि रखने वालों का संक्षेप में यह कथन था कि ‘ इनके कारण क्रमशः ऋतु, रस, दोष, देह इनकी उत्पत्ति होती है ’। सारांश सचेतन सृष्टि, मनुष्य अथवा पुरुष, सूर्य, सोम, वायु इनका ही परिणाम है अर्थात् ये ही पुरुष को पैदा करते हैं।
इस सृष्टि-विज्ञान का वास्तविक नाम हमको मालूम नहीं है और यह भी मालूम नहीं है कि इसके प्रवर्तक आचार्य कौन थे। सुभोते के लिये हमने इस सृष्टि-विज्ञान का नाम ‘ षड्रसवाद ’ और इसके प्रवर्तकों का नाम ‘ षड्रसवादी ’ रक्खा है। आगे यथा समय इस सृष्टि-विज्ञान के भिन्न २ अंशों पर हम अधिक विचार करेंगे।
अन्य अथवा तदुत्तरकालीन दार्शनिक, सचेतन सृष्ट्युत्पत्ति के संबंध में साधारणतः उक्त सृष्टिक्रम को ही स्वीकार करते थे पर उनका तत्व संख्यान, द्रव्यगुण और कार्य-कारण-भाव विषयक मत भिन्न २ था। अतः वे उक्त षड्रसवाद में अपने २ सिद्धांत के अनुसार संशोधन परिवर्तन करते थे और आपस में पुरुषोत्पादक कारणों के विषय में मतभेद भी रखते थे। यज्ञः-पुरुषीय-परिषद्
विषय प्रवेश
५
का आयोजन मुख्यतः इनके पुरुष विषयक उक्त मतभेद को हल करने के लिये ही हुआ ।
इस परिषद् में काशीपति वामक, ( मुख्य प्रस्तावक ) आत्मवादी पारीक्षि मौल्ल्य, सत्त्ववादी शरलोमा, रसवादी उर्फ त्रिधातुसिद्धांत-वादी राजर्षि वार्योविद, षड्धातुवादी उर्फ आद्यसंख्य हिरण्याक्ष कुशिक, परंपरावादी कौशिक, कर्मवादी भद्रकाप्य, स्वभाव उर्फ धातु-पंचकवादी भारद्वाज, प्रजापति-वादी बाल्हीक भिषक् कांकायन, कालवादी भिक्षु आत्रेय और त्रिभागान्तक सिद्धांत में इनका सब का समन्वय करने वाले अध्यक्ष पुनर्वसु आत्रेय सम्मिलित थे । इनके अतिरिक्त पुनर्वसु आत्रेय के पट्टशिष्य अभिवेद्य भी उपस्थित थे ।
यज्ञः—पुरुषीय-परिषद् में इनका संवाद उसी क्रम से हुआ जिस क्रम से हमने उनका नामोलेख किया है । किंतु आयुर्वेद क्षेत्र में उनका प्रवेश इसी क्रम से हुआ हो यह संभव नहीं है ।
हमारी राय में आयुर्वेद के दार्शनिक क्षेत्र में सर्वे प्रथम षड्हरसवाद था । बाद स्वभाववाद, परंपरावाद, कालवाद और रसवाद उर्फ त्रिधातु-सिद्धांत इनका प्रवेश हुआ । षड्हरसवाद को छोड़ दिया जाय तो इनमें स्वभाव अथवा धातु-पंचकवाद और त्रिधातु सिद्धांत ही अधिक प्रभावशाली थे । ये चेतना
३
आयुर्वेद-दर्शन
धातु को स्वतः—सिद्ध नहीं मानते थे। इनके बाद आयुर्वेद क्षेत्र में षड्धातुवाद और प्रजापतिवाद का प्रवेश हुआ। ये आत्मा को स्वतःसिद्ध मानते थे। और इनके बाद आत्मवाद, सत्त्ववाद और कर्मवाद का आयुर्वेद के दार्शनिक क्षेत्र में प्रवेश हुआ।
उनमें कुछ पंचात्मक लोकपक्षीय और कुछ द्विधात्मक लोकपक्षीय थे। जैसा कि “लोको हि द्विविधः स्थावरों-जंगमश्च। द्विविधात्मक एव आग्नेयः सौम्यश्च तदभूयस्त्वात् पंचात्मको वा।” (सु. सू. अ. १) इसमें भी स्वीकार किया गया है।
पंचात्मक लोकपक्षीय, लोक को आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी इनमें विभाजित करते थे। किन्तु इनमें भी कुछ गुर्वादि गुणों को प्रधान मानते थे तो कुछ शब्दादि गुणों को। गुर्वादि गुणप्रधान पंचात्मक लोकपक्षीयों में भी एक संप्रदाय आकाशादि को गुर्वादि गुणवत् नित्य द्रव्य मानता था जैसा कि स्वभाववादी-भारद्वाज-संप्रदाय और दूसरा आकाशादिकों को नित्य द्रव्य नहीं अपितु चेतना धातु के अमतीघातकत्वादि गुण मानता था जैसा कि षड्धातुवादी हिरण्यक्ष संप्रदाय। शब्दादिगुण प्रधान पंचात्मक लोकपक्षीय, आकाशादिकों की उत्पत्ति शब्दस्पर्शादितन्मात्राओं से मानते हैं जैसा कि सत्त्ववादी।