आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
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आयुर्वेद-दर्शन
धातु को स्वतः—सिद्ध नहीं मानते थे। इनके बाद आयुर्वेद क्षेत्र में षड्धातुवाद और प्रजापतिवाद का प्रवेश हुआ। ये आत्मा को स्वतःसिद्ध मानते थे। और इनके बाद आत्मवाद, सत्त्ववाद और कर्मवाद का आयुर्वेद के दार्शनिक क्षेत्र में प्रवेश हुआ।
उनमें कुछ पंचात्मक लोकपक्षीय और कुछ द्विधात्मक लोकपक्षीय थे। जैसा कि “लोको हि द्विविधः स्थावरों-जंगमश्च। द्विविधात्मक एव आग्नेयः सौम्यश्च तदभूयस्त्वात् पंचात्मको वा।” (सु. सू. अ. १) इसमें भी स्वीकार किया गया है।
पंचात्मक लोकपक्षीय, लोक को आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी इनमें विभाजित करते थे। किन्तु इनमें भी कुछ गुर्वादि गुणों को प्रधान मानते थे तो कुछ शब्दादि गुणों को। गुर्वादि गुणप्रधान पंचात्मक लोकपक्षीयों में भी एक संप्रदाय आकाशादि को गुर्वादि गुणवत् नित्य द्रव्य मानता था जैसा कि स्वभाववादी-भारद्वाज-संप्रदाय और दूसरा आकाशादिकों को नित्य द्रव्य नहीं अपितु चेतना धातु के अमतीघातकत्वादि गुण मानता था जैसा कि षड्धातुवादी हिरण्यक्ष संप्रदाय। शब्दादिगुण प्रधान पंचात्मक लोकपक्षीय, आकाशादिकों की उत्पत्ति शब्दस्पर्शादितन्मात्राओं से मानते हैं जैसा कि सत्त्ववादी।