आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविषय प्रवेश
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का आयोजन मुख्यतः इनके पुरुष विषयक उक्त मतभेद को हल करने के लिये ही हुआ ।
इस परिषद् में काशीपति वामक, ( मुख्य प्रस्तावक ) आत्मवादी पारीक्षि मौल्ल्य, सत्त्ववादी शरलोमा, रसवादी उर्फ त्रिधातुसिद्धांत-वादी राजर्षि वार्योविद, षड्धातुवादी उर्फ आद्यसंख्य हिरण्याक्ष कुशिक, परंपरावादी कौशिक, कर्मवादी भद्रकाप्य, स्वभाव उर्फ धातु-पंचकवादी भारद्वाज, प्रजापति-वादी बाल्हीक भिषक् कांकायन, कालवादी भिक्षु आत्रेय और त्रिभागान्तक सिद्धांत में इनका सब का समन्वय करने वाले अध्यक्ष पुनर्वसु आत्रेय सम्मिलित थे । इनके अतिरिक्त पुनर्वसु आत्रेय के पट्टशिष्य अभिवेद्य भी उपस्थित थे ।
यज्ञः—पुरुषीय-परिषद् में इनका संवाद उसी क्रम से हुआ जिस क्रम से हमने उनका नामोलेख किया है । किंतु आयुर्वेद क्षेत्र में उनका प्रवेश इसी क्रम से हुआ हो यह संभव नहीं है ।
हमारी राय में आयुर्वेद के दार्शनिक क्षेत्र में सर्वे प्रथम षड्हरसवाद था । बाद स्वभाववाद, परंपरावाद, कालवाद और रसवाद उर्फ त्रिधातु-सिद्धांत इनका प्रवेश हुआ । षड्हरसवाद को छोड़ दिया जाय तो इनमें स्वभाव अथवा धातु-पंचकवाद और त्रिधातु सिद्धांत ही अधिक प्रभावशाली थे । ये चेतना