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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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काल का सूर्यचंद्रवायुओं में समन्वय....१४०
,, धातुपंचक में समन्वय...१४१
,, अग्निषोम संज्ञक धर्मों में समन्वय....१४२
भिन्न अत्रिय के मत से काल अर्थात् विश्व
व्यापिनी गति....१४३
पुनर्वसु अत्रिय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत....१४५
पक्षराग त्याग और अध्यात्म चिंतन का उपदेश ....१४५
भावों के संपद्विषय का पुरुषरोगोत्पादकत्व....१४५
भावों के विषय में...१४६
अध्यात्म चिंतन का हेतु...१४६
भारद्वाज के प्रति उत्तर...१४७
पक्षराग त्याग का हेतु...१६१
त्रिभागात्मक सिद्धांत...१६२
त्रिभागात्मक सिद्धांत का तात्त्विक स्वरूप...१६२
ज्ञातृत्व और कर्तृत्व में जन्यजनक संबंध नहीं है ......१६४
अन्योऽन्यानुविधायित्व...१६७
अत्रिय की दृष्टि से पुरुषोत्पादक भाव...१६८
तंत्र की भाषा में पुरुष की अभिदृष्टि का कारण......१६८
त्रिभागात्मक सिद्धांत को धान्वतरो की मान्यता,,
त्रिभागात्मक सिद्धांतही आयुर्वेद का निष्णात
सृष्टिविज्ञान है....१७१