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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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आयुर्वेद-दर्शन

किसी समय ( अथवा सर्व प्रथम ) आयुर्वेद में वह सृष्टि विज्ञान प्रचलित था जिसका आरंभ सूर्य, चंद्र और वायु इन प्रत्यक्ष जागतिक चमत्कारों अथवा देवताओं से होता है। इन पर टाँछि रखने वालों का संक्षेप में यह कथन था कि ‘ इनके कारण क्रमशः ऋतु, रस, दोष, देह इनकी उत्पत्ति होती है ’। सारांश सचेतन सृष्टि, मनुष्य अथवा पुरुष, सूर्य, सोम, वायु इनका ही परिणाम है अर्थात् ये ही पुरुष को पैदा करते हैं।

इस सृष्टि-विज्ञान का वास्तविक नाम हमको मालूम नहीं है और यह भी मालूम नहीं है कि इसके प्रवर्तक आचार्य कौन थे। सुभोते के लिये हमने इस सृष्टि-विज्ञान का नाम ‘ षड्रसवाद ’ और इसके प्रवर्तकों का नाम ‘ षड्रसवादी ’ रक्खा है। आगे यथा समय इस सृष्टि-विज्ञान के भिन्न २ अंशों पर हम अधिक विचार करेंगे।

अन्य अथवा तदुत्तरकालीन दार्शनिक, सचेतन सृष्ट्युत्पत्ति के संबंध में साधारणतः उक्त सृष्टिक्रम को ही स्वीकार करते थे पर उनका तत्व संख्यान, द्रव्यगुण और कार्य-कारण-भाव विषयक मत भिन्न २ था। अतः वे उक्त षड्रसवाद में अपने २ सिद्धांत के अनुसार संशोधन परिवर्तन करते थे और आपस में पुरुषोत्पादक कारणों के विषय में मतभेद भी रखते थे। यज्ञः-पुरुषीय-परिषद्