आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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Read in contextविवेच्य प्रवेश
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इसके अतिरिक्त दो बातों का और भी विचार करना होगा। पहिली यह कि यज्ञः—पुरुषीय—परिषद् में जिन दार्शनिक संप्रदायों का उल्लेख है वे सांख्य-वेदांत-न्याय-योग-सूत्र प्रतिपादित दर्शनों से प्राचीन मालूम होते हैं। अर्थात् श्रीमद् व्यास के वेदांत सूत्रों की रचना यज्ञः—पुरुषीय—परिषद् के बाद हुई है। दूसरी यह कि यह परिषद् उस समय हुई जिस समय बाल्हीक देश में एक मात्र वैदिक संप्रदाय प्रचलित था।
यज्ञः—पुरुषीय—परिषद् में जिन दार्शनिक संप्रदायों का उल्लेख है उनके पूर्वोपपत्थ का निश्चय करना जितना गंभीर है उतना ही आवश्यक है। इस विषय में मैं उनसे सहमत हूँ जो कि यह प्रतिपादन करते हैं कि मानवीयज्ञान की अभिवृद्धि क्रमशः और स्वाभाविकरीत्या पैदा होने वाली आवश्यकताओं के अनुसार हुई है। इस तरह देखा जाय तो सर्व प्रथम आधिदैविक दार्शनिकों का तत्पश्चात् आधिभौतिक दार्शनिकों का और तत्पश्चात् आध्यात्मिक दार्शनिकों का अभ्युत्थान स्वीकार करना स्वाभाविक है। यज्ञः—पुरुषीय—परिषद् की चर्चा में यह क्रम दिखाई नहीं देता और यह कोई आवश्यक भी नहीं है कि सभा समितियों में अपने ऐतिहासिक पूर्वोपपत्थ के अनुसार ही आगे पीछे बोला जाय।