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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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आयुर्वेद-दर्शन

इन संप्रदायों से संबंध रखने वाले कतिपय अंश सुश्रुत-संहिता अष्टांगसंग्रह आदि तंत्रों में भी दिखाई देते हैं। चरकाचार्य नागाजुन आदि संस्कारकर्ताओं ने इन वचनों का इस कदर संहितीकरण किया है कि उसका विश्लेषण करके प्रत्येक संप्रदाय के भिन्न २ वक्तव्य को समुचित रूप से जानना कठिन है। फिर भी 'यज्ञः पुरुषीय परिषद्' के आधार पर उन अंशों को जानने का हम यथामति सत्साहस करते हैं।

यह मानना अधिक संतोषजनक है कि यज्ञः—पुरुषीय-परिषद् का आयोजन भारतीय युद्ध के पूर्व किसी समय हुआ। क्योंकि इस परिषद् में जो ऋषि उपस्थित थे उनमें से कतिपय के नाम ब्राह्मण ग्रंथों में उपलब्ध होते हैं। महाभारत के आदि पर्व में लिखित द्रोणाचार्य की जीवनी पर से यह ज्ञात होता है कि द्रोणाचार्य का अध्ययन कुलपति अग्निवेश के आश्रम में हुआ। उक्त अग्निवेश, यदि पुनर्वसु के पट्टशिष्य अग्निवेश ही हों तो यज्ञः—पुरुषीय-परिषद् का समय युद्धपूर्व ही होगा। पुनर्वसु आत्रेय जो कि इस परिषद् के अध्यक्ष थे; त्रेतायुग के अंत तक ही 'युगधर्म' का विवेचन (च. वि. अ. ३) करते हुए दिखाई देते हैं। इस पर से भी यह अनुमान किया जा सकता है कि उनके लिये द्वापर युग वर्तमान समय की घटना थी।