आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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इन परिषद् में जो ऋषि उपस्थित थे वे भिन्न २ सृष्टि विज्ञानों के समर्थक और अधिकांश भिन्न २ आयुर्वेदिक तंत्रों के प्रवर्तक थे। इनका लक्ष्य मुख्यतः भाव स्वभाव, आयु, पुरुष, रोग आदि सृष्टि विज्ञान संबंधी विषयों पर था। मान्य होता है कि सृष्टिविज्ञान प्रधान परिषद् में प्रायः आयुर्वेद तंत्र प्रवर्तक ही उपस्थित हुआ करते थे। किंतु जो शब्दादि तन्मात्राओं को कारण गुण मानते थे वे आयुर्वेद तंत्र प्रवर्तक नहीं थे। इन परिषद् का आयुर्वेद में संग्रह किया जाना स्वाभाविक है। पर आयुर्वेद का अध्ययन कभी सर्व साधारण का विषय नहीं रहा और इस कारण ही सर्व साधारण समाज इनसे अपरिचित रहा।
यज्ञः पुरुषीय परिषद् में जिन भिन्न २ सृष्टिविज्ञानों का उल्लेख है उनके स्वरूप, उत्थान, पौर्यापथ्य, संबंध आदि पर विचार किया जाय तो तर्पूर्वकालीन सहस्रां वर्षों का वह वैज्ञानिक इतिहास उपलब्ध होगा जिसके कि आधार पर समस्त आर्यज्ञान विकास की कड़ियाँ क्रमशः जोड़ी जा सकती हैं। इसमें प्रधान आपत्ति यह है कि इनका विवरण अत्यंत संक्षेप में उपलब्ध होता है। फिर भी पूर्व संस्कारों को छोड़कर सावधानी से अन्वेषण किया जाय तो इसमें भी सफल हो सकते हैं। इसके लिये सर्व प्रथम यह स्वीकार करने की आवश्यकता है कि सृष्टिविज्ञानों का यह नाटक शिष्य मुष्टि वैद्यार्थ्य नहीं है बल्कि किसी समय इनका प्रचार था और इनके आधार पर आयुर्वेदिक तंत्र भी रचे गये थे।
आयुर्वेद के अभ्यासक भलीभांति जानते हैं कि आयुर्वेद के तंत्र ( हेतु लिंगोपथ ) और मंत्र ( दर्शन ) विषयक कई विधानों में परस्पर विरोध और पारिभाषिक शब्दों में विभिन्नता है। हमारे मत