भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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से इनका संबंध भिन्न २ सृष्टिविज्ञानों से है। इनको उन २ सृष्टि विज्ञानों के साथ जोड़ा जाय तो दोनों पर अधिक प्रकाश पड़ता है। यज्ञः पुरुषीय परिपद में जो ऋषि उपस्थित थे वे अन्य परिषदों में भी उपस्थित थे। उन परिषदों में उन्होंने जो वक्तव्य दिया है वह भी उनके सृष्टि विज्ञान पर प्रकाश डालता है। इस तरह अंतर्गत प्रमाणों के द्वारा उनका कुछ स्वरूप व्यक्त हो जाने पर वैदिक, औपनिषदिक, और तदनुकूल प्रमाणों की सहायता से भी इनका अधिक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

उक्त पद्धति से जब इन सृष्टिविज्ञानों का अध्ययन किया गया तब यह ज्ञात हुआ कि आर्य ज्ञानेतिहास में इन सृष्टि विज्ञानों का अस्तित्व अध्यात्म प्रधान दर्शनों और उपनिषदों के भी पहिले था। इनके पौराणपर्य पर से यह भी ज्ञात होगा कि सृष्टिविज्ञानों की इस परंपरा में वैदिक सृष्टिविज्ञानों का संबंध कहाँ से शुरू होता है और आयुर्वेद को किस अर्थ में उपवेद कहा जासकता है। शिवाय संस्कार कर्ताओं ने आयुर्वेद प्रादुर्भाव विषयक औपदेशिक परंपरा का जो इतिहास दिया है वह कहाँ तक ठीक है। इसमें संदेह नहीं कि चरक-संहिता में आयुर्वेद के नित्यत्व के विषय में जो यह कहा गया है कि “सोऽयमायुर्वेदः; शाश्वतो निदिश्यते, अनादित्वात्, स्वभावसंश्लिष्ट-लक्षणत्वत्, भावस्वभावनित्यत्वाच्च इ०” उसकी यथार्थता इन सृष्टिविज्ञानों पर से भली भाँति विदित होसकती है।

यदि यह कहा जाय कि आयुर्वेद दर्शन, इन भिन्न २ सृष्टिविज्ञानों की गुंथी हुई माला है अथवा इनके सर्व सम्मत सिद्धांतों का निचोड़ है तो अनुचित न होगा। क्योंकि इन परिषदों में मुख्यतः इसी बात का यल हुआ कि पश्चात् का छोड़ कर एक निर्णय पर पहुंचा जाय