बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in contextसप्तमः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने चतुर्थोऽध्यायः २३१
ब्राह्मण कैसे कहा जा सकता है ? जो द्विजाति व्यक्ति सायं और प्रातः सन्ध्योपासना नहीं करता उसे धार्मिक राजा शूद्र के कार्यों में लगावे ॥ १५ ॥
प्रजापतिग्रहणमादरार्थम् । अनागतामनतिक्रान्तामिति चोदितकालाभिप्रा- यम् । कथं ते ब्राह्मणा इति । विप्रग्रहणं च द्विजात्युपलक्षणार्थम् । अत एव शूद्रकर्मस्वित्युक्तम् । इतरथा क्षत्रियकर्मस्वित्यवक्ष्यत् आनन्त्यात् । आह च-
न तिष्ठति तु यः पूर्वामुपास्ते न च पश्चिमाम् ।
स शूद्रवद् बहिष्कार्यस्सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ॥ इति ॥ १५ ॥
तथा कथम् ?
तत्र सायमतिक्रमे रात्र्युपवासः प्रातरतिक्रमेऽहरुपवासः ॥ १६ ॥
**अनु०—**यदि सायंकाल सन्ध्योपासना का समय सन्ध्योपासना किये बिना ही बीत जाय, तो रात्रि को उपवास करे और प्रातःकालीन सन्ध्योपासना का समय सन्ध्योपासना किये बिना ही बीतने पर दिन में उपवास करे ॥ १६ ॥
अतीतां तां सन्ध्यां कृत्वेति शेषः । उपवासोऽनशनम् ॥ १६ ॥
किञ्च—
स्थानासनफलमवाप्नोति ॥ १७ ॥
**अनु०—**इस प्रायश्चित्त से वह वही फल प्राप्त करता है जो सन्ध्योपासना में खड़े होकर तथा बैठकर प्राप्त किया जाता है ॥ १७ ॥
प्रायश्चित्तप्रशंसेषा ॥ १७ ॥
अथाऽप्युदाहरन्ति—
यदुपस्थकृतं पापं पद्भ्यां वा यत्कृतं भवेत् ।
बाहुभ्यां मनसा वाऽपि वाचा वा यत्कृतं भवेत् ।
सायं सन्ध्यामुपस्थाय तेन तस्मात्प्रमुच्यते ॥१८॥
**अनु०—**इस सम्बन्ध में भी निम्नलिखित पद्य उद्धृत करते हैं—
पुरुष जननेन्द्रिय से, पैरों से जो कुछ पाप कर्म किये रहता है, जो कुछ पाप बाहों से, अथवा मन से या वाणी से किये होता है, उन सभी पापों से सायंकालीन सन्ध्या करने पर मुक्त हो जाता है ॥ १८ ॥
**टि०—**जननेन्द्रिय विषयक दुष्कृत यहाँ स्वभार्या के ही संबन्ध में हैं, क्योंकि परदारगमन के प्रायश्चित्त विशेष रूप से बताये गये हैं। स्वभार्या का ऋतुकाल से भिन्न समय में संभोग अधर्म है। पैरों से दुष्कृत का तात्पर्य है निषिद्ध स्थान पर