बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in context२३२ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ सन्ध्योपासनम्
अनजाने जाना। बाहुओं से दुष्कृत हिंसा, छेदन, भेदन आदि। दूसरों की वस्तुओं के प्रति लोभ बुद्धि रखना मानसिक दुष्कृत का उदाहरण है। अप्रिय और असत्य वाणी के दुष्कृत का उदाहरण है। अप्रिय और असत्य भाषण वाणी के दुष्कृत के अन्तर्गत आते हैं।
उपस्थकृतं परभार्या प्रति बहुशः प्रायश्चित्तस्याऽऽम्नानादिह स्वभार्याया-मेवाऽनृतकालाद्युपयोगेऽनाम्नाते। पद्भ्यां यदबुद्धिपूर्वप्रतिषेधगमनादि कृतम्। बाहुभ्यामपि हिंसाच्छेदनभेदनादि हस्तचापल्यं तत्। तथा मनसा परद्रव्यस्याऽ-भिध्यानादि। वाचा कृतं अवद्यवदनादि। यत्र यत्र वाङ्मनःकायकृते प्रायश्चित्ताम्नानविरोधो नास्ति, तत्र तत्रैतदेव प्रायश्चित्तमित्यभिप्रायः। सन्ध्यो-पासनप्रशंसा वैषा ॥ १८ ॥
किञ्च— रात्र्या चाऽपि सन्धीयते ॥ १९ ॥
अनु०—सन्ध्योपासना करने वाला आगामी रात्रि से सम्बद्ध हो जाता है॥१९॥
पुरुष इति शेषः। अभिसन्धानमभ्युदयः ॥ १९ ॥
न चैनं वरुणो गृह्णाति ॥ २० ॥
अनु०—वरुण देवता उसकी मृत्यु नहीं करते ॥ २० ॥
टि०—अर्थात् वह जल में डूबकर या जलोदर व्याधि से नहीं मरता—गोविन्द-स्वामी।
वरुणो नाम वृणातेः पापमप्सु मरणं जलोदरव्याधिर्वा ॥ २० ॥
एवमेव प्रातरुपस्थाय रात्रिकृतात् पापात् प्रमुच्यते ॥२१॥
अनु०—इसी प्रकार प्रातः सन्ध्योपासना कर रात्रि में किये गये पापों से पुरुष मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥
अर्थवादातिदेशः। फलातिदेशो वाऽयम्। रात्रावुपस्थादिभिः कृतादि-त्यर्थः। २१ ॥
अह्ना चाऽपि सन्धीयते ॥ २२ ॥
अनु०—उसका सम्बन्ध आगामी दिन के साथ हो जाता है ॥ २२ ॥
पूर्वैव व्याख्या ॥ २२ ॥
मित्रश्चैनं गोपायत्यादित्यश्चैनं स्वर्गं लोकङ्गमयतीति ॥२३॥
अनु०—मित्र देवता उसकी रक्षा करते हैं और आदित्य उसे स्वर्ग लोक को पहुँचाता है ॥ २३ ॥