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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

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३६०बौधायन-धर्मसूत्रम्[ प्रायश्चित्तजपादि

प्रसृतयावको हिरण्यप्राशनं घृतप्राशनं सोमपानमिति मेध्यानि ॥१२॥

**अनु०—**केवल दूध का आहार करना, शाक भक्षण करना, केवल फलों को ही खाना, केवल मूल का आहार करना, केवल एक मुट्ठी जौ का बना यावक खाकर रहना, सुवर्ण का प्राशन करना, घृत पान करना, सोमपान करना—ये पवित्र करने वाली वृत्तियां हैं और उसमें प्रत्येक अपने पहले की अपेक्षा अधिक पवित्र करने वाली है ॥ १२ ॥

उपसन्नधायः—आराग्ना, परोवरीयसो वा। प्रसृतयावको व्याख्यातः। इतिकरणेनैवं प्रकारं पञ्चगव्यादि परिगृह्यते ॥ १२ ॥

सर्वे शिलोच्चयाः सर्वाः स्रवन्त्यः सरितः पुण्याह्रदास्तीर्थाण्यृषिनिकेतनानि गोष्ठक्षेत्रपरिष्कन्दा इति देशाः ॥ १३ ॥

**अनु०—**सभी पर्वत, सभी बहने वाली नदियां, पवित्र जलाशय, तीर्थ ( स्नान के घाट ), ऋषियों के आश्रम, गायों के रहने का घर, क्षेत्र और देवों के मन्दिर और गुफाएँ—ये सभी पाप को दूर करने वाले स्थान हैं ॥ १३ ॥

शिलोच्चयाः शिलानामुच्चयाः पर्वता इत्यर्थः । स्रवन्त्यो नद्यः । ह्रदा ह्लादतेश्शब्दकर्मणः ह्लादतेर्वा शीतभावकर्मणः । अच् पृषोदरादिः । श्रीपुष्करादयः । इतः प्रभृति पुण्यानुसन्धानात् पूर्वत्राऽपुण्या अपि पर्वतादयोऽभ्यनुज्ञायन्ते । ऋषिनिकेतनानि ऋषिनिवासाः ऋष्याश्रमाः । क्षेत्रं कुरुक्षेत्रम् । परिष्कन्दा देवालयाः गुहावासप्रदेशाः । इति शब्दादग्न्यगारादयः ॥ १३ ॥

अथैतानि तपांसि—

अहिंसा सत्यमस्तैन्यं सवनेषूदकोपस्पर्शनं गुरुशुश्रूषा ब्रह्मचर्यमधश्शयनमेकवस्त्रताऽनाशक इति तपांसि ॥ १४ ॥

**अनु०—**अहिंसा, सत्यभाषण, चोरी न करना, तीनों सवन काल में स्नान करना, गुरु की सेवा, ब्रह्मचर्य का पालन, भूमि पर शयन करना, केवल एक वस्त्र धारण करना और भोजन का त्याग करना—ये सभी तप हैं ॥ १४ ॥

तपांसि तपोहेतवः । सवनं पूर्वाह्नमध्यन्दिनापराह्नाः । इतिशब्दो देवद्विजपूजार्थः ॥ १४ ॥


द्वयम्—आराग्ना परोवरीयसीति । अल्पशः आरम्भः क्रमशो वृद्धिरित्याराग्ना । अर्थात् आरम्भदिनेऽल्पं पय आदिकं भक्षयेत् । प्रतिदिनं च क्रमशो वर्धयेदित्यराग्ना । तद्विपरीता परोवरीयसी तन्न्यायेनाऽत्रापि व्रतकल्पो विकल्पेन वेदितव्य इत्यर्थः ॥