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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

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प्रथमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ३६९

प्राणायामान् पवित्राणि व्याहृतीः प्रणवं तथा ।
पवित्रपाणिरासीनो ब्रह्म नैत्यकमभ्यसेत् ॥ २४ ॥

**अनु०—**प्राणायाम, पुरुष सूक्त आदि पवित्र करने वाले मन्त्र और सूक्त, व्याहृतियाँ और प्रणव तथा वेद के अंश का प्रतिदिन हाथ में कुश लेकर और बैठकर जप करे ॥ २४ ॥

पवित्राणि पुरुषसूक्तादीनि । शरीरस्याऽहर्निशं पापसंचयोऽवश्यं भवतीति मत्वा नैत्यकं ब्रह्माऽभ्यसेदित्युक्तम् ॥ २४ ॥

किञ्च—

आवर्तयेत्सदा युक्तः प्राणायामान् पुनः पुनः ।
आकेशान्तान्नखाग्राच्च तपस्तप्यत उत्तमम् ॥
निरोधाज्जायते वायुर्वायोरग्निश्च जायते ।
तापेनाऽऽपोऽधिजायन्ते ततोऽन्तश्शुद्ध्यते त्रिभिः ॥

अनु० योगाभ्यास में लगकर सदैव बार-बार प्राणायाम की आवृत्ति करे । इससे वह केशों के अन्त तक और नखों के अग्र भाग तक उत्तम तप के आचरण से युक्त हो जाता है । प्राणवायु के निरोध से वायु उत्पन्न होता है और वायु से अग्नि उत्पन्न होता है । अग्नि से जल उत्पन्न होता है, तब इन तीनो से सूक्ष्म शरीर या अन्तरात्मा शुद्ध हो जाता है ॥ २५ ॥

कोष्ठे वायुर्जायते । वायोरग्निः । अग्नेरापः तैस्त्रिभिरन्तस्सूक्ष्मशरीरं शुद्ध्यति ॥ २५ ॥

आवर्तयेत् सदा युक्त इत्युक्तम् , तत्प्रसङ्गादिदमाह--

योगेनाऽऽवाप्यते ज्ञानं योगो धर्मस्य लक्षणम् ।
योगमूला गुणास्सर्वे तस्माद्युक्तस्सदा भवेत् ॥ २६ ॥

**अनु०—**योग से तत्त्वज्ञान की प्राप्ति होती है । योग ही धर्म का सार है । सभी गुण योग से ही उत्पन्न होते हैं । अतएव सदैव योग का अभ्यास करना चाहिए ॥ २६ ॥

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः, तथोक्तम्—
प्राणायामास्तथा ध्यानं प्रत्याहारोऽथ धारणा ।
तर्कश्चैव समाधिश्च षडङ्गो योग उच्यते ॥ इति ॥

२७ बौ०ध०

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