बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट
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Read in contextऔर नागराज ने मुझ अभागिनी के एकमात्र पुत्र, तुम्ही को क्यो चुन लिया ?''
इस प्रकार रोती-बिलखती हुई उस मां से उसके युवा पुत्र ने कहा—‘‘मां, मैं तो स्वय ही बहुत दुखी हूं। तुम मुझे और दुखी क्यों कर रही हो ? अब तुम घर लौट जाओ। मैं तुम्हें अंतिम प्रणाम करता हूं। गरुड़ के आने का समय हो रहा है। '' यह सुनकर वृद्धा पछाड़ खाकर गिर पड़ी और किसी की सहायता मिलने की आशा में इधर-उधर व्याकुल नेत्रों से देखने लगी।
यह सब देखकर और सुनकर बोधिसत्व के अंश-रूप जीमूतवाहन को बड़ी दया आई। वह सोचने लगा 'आह ! तो यही है शंखचूड़ नामक वह नाग, जिसे वासुकि ने गरुड़ के भोजन के लिए भेजा है और यह इसकी वृद्धा माता है जो अपने एकमात्र पुत्र के स्नेह के कारण ममतावश रोती हुई यहां तक आई है। आज यदि मैंने इसके जीवन की रक्षा न की तो मेरे जीवन को धिक्कार है।'
यह सोचकर वह उस वृद्धा और युवक के पास पहुंचा और बोला—‘‘मां तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हारे पुत्र की रक्षा करूंगा।'' वृद्धा उसे देखकर भयभीत हो गई। उसने समझा कि वही गरुड है। ऐसा विचारकर उसने कातर स्वर मे जीमूतवाहन से कहा—‘‘गरुड़, मेहरबानी करके तुम मुझे खा लो किंतु मेरे पुत्र का जीवन बख्श दो।''
तब शंखचूड़ ने अपनी माता को धीरज दिया—‘‘मां, तुम डरो मत, यह गरुड़ नही है। कहां चंद्रमा के समान आनद देने वाले ये महापुरुष और कहां वह नागभक्षी गरुड़ ! शंखचूड़ के ऐसा कहने पर जीमूतवाहन ने कहा—‘‘मां, तुम घबराओ नहीं, मैं एक विद्याधर हूं। तुम्हारे पुत्र की रक्षा के लिए यहां आया हूं। उस मूर्ख गरुड़ को मै अपना शरीर अर्पित करूंगा। तुम अपने पुत्र के साथ घर लौट जाओ।''
यह सुनकर वृद्धा ने कहा—‘‘ऐसा मत कहो, तुम भी मेरे पुत्र के समान हो। तुमने मेरे पुत्र की जगह अपना बलिदान देने की बात कहकर मुझ पर बहुत कृपा की है।''
तब जीमूतवाहन ने कहा—‘‘मां, जब तुमने मुझे पुत्र कहकर यह सम्मान दिया है तो मेरे मनोरथ को सिद्ध होने दो, मुझे इस बलिदान से मत रोको, मां ! अन्यथा मैं यह समझूंगा कि मेरा जीवन व्यर्थ ही गया। ''
जीमूतवाहन ने जब ऐसा कहा, तब शंखचूड़ उससे बोला—‘‘हे महासत्त्व, तुमने सचमुच बहुत दयालुता दिखलाई है किंतु मैं अपने लिए तुम्हारे जीवन का बलिदान स्वीकार नहीं कर सकता। मेरे जैसे साधारण व्यक्तियों से तो यह संसार भरा पड़ा है किंतु आप जैसे विरले ही इस संसार में मिलते हैं। हे सुबुद्धि ! चन्द्रबिंब के कलंक के समान मैं अपने पिता शंखपाल के पवित्र कुल को मलिन न कर सकूंगा।''
ऐसा कहकर शंखचूड़ ने अपनी माता से कहा—‘‘मां, तुम इस दुर्गम वन से लौट जाओ। क्या तुम इस वध्य-शिला को नहीं देखती जो सर्पों के रक्त से भीगी हुई है
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