बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ (भूमिका एवं विषय-सूची)
बेताल पच्चीसी
सोमदेव भट्ट कृत
बेताल पच्चीसी
रूपांतरकार
वेद प्रकाश सोनी
चित्रांकन
शंकर नायक
प्रकाशक
जन साहित्य परिषद्
मकान नं. 29/32बी, गली नं. 12
विश्वास नगर, दिल्ली-110032
प्रकाशक : जन साहित्य परिषद्
मकान नं. 29/32बी, गली नं. 12
विश्वास नगर, दिल्ली-110032
मूल्य : 200.00 रुपये
संस्करण : सन् 2002
आवरण : एस. के. ग्राफिक्स, दिल्ली-110032
शब्द-संयोजन : एस. के. कम्प्यूटर्स, दिल्ली-110032
मुद्रक : एस. एन. प्रिंटर्स, दिल्ली-110032
अनुक्रम
प्रारंभ \hfill 7
प्रथम बेताल \hspace{1.5em} पद्मावती की कथा \hfill 9
द्वितीय बेताल \hspace{1.5em} तीन तरुण ब्राह्मणों की कथा \hfill 17
तृतीय बेताल \hspace{1.5em} शुक-सारिका की कथा \hfill 21
चौथा बेताल \hspace{1.5em} वीरवर की कथा \hfill 28
पांचवां बेताल \hspace{1.5em} सोमप्रभा की कथा \hfill 36
छठा बेताल \hspace{1.5em} रजक-कन्या की कथा \hfill 40
सातवां बेताल \hspace{1.5em} सत्त्वशील की कथा \hfill 44
आठवां बेताल \hspace{1.5em} तीन चतुर पुरुषों की कथा \hfill 51
नौवां बेताल \hspace{1.5em} राजकुमारी अनंगरति की कथा \hfill 55
दसवां बेताल \hspace{1.5em} मदनसेना की कथा \hfill 59
ग्यारहवां बेताल \hspace{1.5em} राजा धर्मवज की कथा \hfill 64
बारहवां बेताल \hspace{1.5em} यशकेतु की कथा \hfill 67
तेरहवां बेताल \hspace{1.5em} ब्राह्मण हरिस्वामी की कथा \hfill 77
चौदहवां बेताल
वणिक-पुत्री की कथा 82
पंद्रहवां बेताल
शशिप्रभा की कथा 87
सोलहवां बेताल
जीमूतवाहन की कथा 95
सत्रहवां बेताल
उन्मादिनी की कथा 107
अठारहवां बेताल
ब्राह्मणकुमार की कथा 111
उन्नीसवां बेताल
चंद्रस्वामी की कथा 117
बीसवां बेताल
राजा और ब्राह्मण-पुत्र की कथा 124
इक्कीसवां बेताल
अनंगमंजरी व मणिवर्मा की कथा 132
बाईसवां बेताल
चार ब्राह्मण भाइयों की कथा 137
तेईसवां बेताल
अघोरी तपस्वी की कथा 141
चौबीसवां बेताल
एक अद्भुत कथा 145
पच्चीसवां बेताल
भिक्षु शान्तशील की कथा 149
प्रारंभ (विक्रमादित्य और भिक्षु)
प्रारंभ
प्राचीन काल की बात है, तब उज्जैयनी (वर्तमान में उज्जैन) में महाराज विक्रमादित्य राज किया करते थे। विक्रमादित्य हर प्रकार से एक आदर्श राजा थे। उनकी दानशीलता की कहानियां आज भी देश के कोने-कोने में सुनी जाती हैं। राजा प्रतिदिन अपने दरबार में आकर प्रजा के दुखों को सुनते व उनका निवारण किया करते थे। एक दिन राजा के दरबार में एक भिक्षु आया और एक फल देकर चला गया। तब से वह भिक्षु प्रतिदिन राजदरबार में पहुंचने लगा। वह राजा को एक फल देता और राजा उसे कोषाध्यक्ष को सौंप देता। इस तरह दस वर्ष व्यतीत हो गए। हमेशा की तरह एक दिन जब वह भिक्षु राजा को फल देकर चला गया तो राजा ने उस दिन फल को कोषाध्यक्ष को न देकर एक पालतू बंदर के बच्चे को दे दिया जो महल के किसी सुरक्षाकर्मी का था और उससे छूटकर राजा के पास चला आया था। उस फल को खाने के लिए जब बंदर के बच्चे ने उसे बीच से तोड़ा तो उसके अंदर से एक बहुत ही उत्तम कोटि का बहुमूल्य रत्न निकला। यह देखकर राजा ने वह रत्न ले लिया और कोषाध्यक्ष को बुलाकर उससे पूछा—‘‘मैं रोज-रोज भिक्षु द्वारा लाया हुआ जो फल तुम्हें देता हूं, वे फल कहां हैं?’’
राजा ने आज्ञा दी तो कोषाध्यक्ष रत्न-भंडार गया और कुछ ही देर बाद आकर राजा को बताया—‘‘प्रभु, वे फल तो सड़-गल गए, वे मुझे वहां नहीं दिखाई दिए। हां, चमकती-झिलमिलाती रत्नों की एक राशि वहां अवश्य मौजूद है।’’
यह सुनकर राजा कोषाध्यक्ष पर प्रसन्न हुए और उसकी निष्ठा की प्रशंसा करते हुए सारे रत्न उसे ही सौंप दिए। अगले दिन पहले की तरह जब वह भिक्षु फिर राजदरबार में आया तो राजा ने उससे कहा—‘हे भिक्षु ! इतनी बहुमूल्य भेंट तुम प्रतिदिन मुझे क्यों अर्पित करते हो ? अब मैं तब तक तुम्हारा यह फल ग्रहण नहीं करूंगा, जब तक तुम इसका कारण नहीं बताओगे।’’
राजा के कहने पर भिक्षु उन्हें अलग स्थान पर ले गया और उनसे कहा—‘‘हे राजन, मुझे एक मंत्र की साधना करनी है, जिसमें किसी वीर पुरुष की सहायता अपेक्षित है। हे वीरश्रेष्ठ ! उस कार्य में मैं आपकी सहायता की याचना करता हूं।’’
यह सुनकर राजा ने उसकी सहायता करने का वचन दे दिया। तब संतुष्ट होकर भिक्षु ने राजा से फिर कहा—‘‘देव, तब मैं आगामी अमावस्या को यहां के महाश्मशान में, बरगद के पेड़ के नीचे आपकी प्रतीक्षा करूंगा। आप कृपया वहीं मेरे पास आ जाना।’’
‘‘ठीक है, मै ऐसा ही करूंगा।’’ राजा ने उसे आश्वस्त किया। तब वह भिक्षु संतुष्ट
बेताल पच्चीसी ▢ 7
होकर अपने घर चला गया। जब अमावस्या आई, तो राजा को भिक्षु को दिए अपने वचन का स्मरण हो आया और वह नीले कपड़े पहन, माथे पर चंदन लगाकर तथा हाथ में तलवार लेकर गुप्त रूप से राजधानी से निकल पड़ा। राजा उस श्मशान में पहुंचा, जहां भयानक गहरा और घुप्प अंधेरा छाया हुआ था। वहां जलने वाली चिताओं की लपटें बहुत भयानक दिखाई दे रही थीं। असंख्य नर-कंकाल, खोपड़ियां एवं हड्डियां इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं। समूचा श्मशान भूत-पिशाचों से भरा पड़ा था और सियारों की डरावनी आवाजें श्मशान की भयानकता को और भी ज्यादा बढ़ा रही थीं। निर्भय होकर राजा ने वहां उस भिक्षु को ढूंढा। भिक्षु एक वट-वृक्ष के नीचे मंडल बना रहा था। राजा ने उसके निकट जाकर कहा—‘‘भिक्षु, मैं आ गया हूं। बताओ, मुझे क्या करना होगा?’’ राजा को उपस्थित देखकर भिक्षु बहुत प्रसन्न हुआ। उसने कहा—‘‘राजन ! यदि आपने मुझ पर इतनी कृपा की है तो एक कृपा और कीजिए, आप यहां से दक्षिण की ओर जाइए। यहां से बहुत दूर, श्मशान के उस छोर पर आपको शिंशपा (शीशम) का एक विशाल वृक्ष मिलेगा। उस पर एक मरे हुए मनुष्य का शरीर लटक रहा है। आप उस शव को यहां ले आइए और मेरा कार्य पूरा कीजिए। ’’ राजा विक्रमादित्य भिक्षु की बात मानकर वहां से दक्षिण की ओर चल पड़े।
जलती हुई चिताओं के प्रकाश के सहारे वे उस अंधकार में आगे बढ़ते गए और बड़ी कठिनाई से उस वृक्ष को खोज पाए। वह वृक्ष चिताओं के धुएं के कारण काला पड़ गया था। उससे जलते हुए मांस की गंध आ रही थी। उसकी एक शाखा पर एक शव इस प्रकार लटका हुआ था जैसे किसी प्रेत के कंधे पर लटक रहा हो। राजा ने वृक्ष पर चढ़कर अपनी तलवार से डोरी काट डाली और शव को जमीन पर गिरा दिया। नीचे गिरकर वह शव बड़ी जोर से चीख उठा, जैसे उसे बहुत पीड़ा पहुंची हो। राजा ने समझा कि वह मनुष्य जीवित है। राजा को उस पर दया आई। अचानक उस शव ने जोर से अट्टहास किया। तब राजा समझ गया कि उस पर बेताल चढ़ा हुआ है। राजा उसके अट्टहास करने का कारण जानने की कोशिश कर रहा था कि अचानक शव में हरकत हुई और वह हवा में उड़ता हुआ पुनः उसी शाखा पर जा लटका। इस पर राजा एक बार फिर से वृक्ष पर चढ़ा और शव को पुनः नीचे उतार लिया। फिर राजा ने उस शव को अपने कंधे पर डाला और खामोशी से भिक्षु की ओर चल पड़ा। कुछ दूर चलने पर राजा के कंधे पर सवार शव के अंदर का बेताल बोला—‘‘राजन, मुझे ले जाने के लिए तुम्हें बहुत परिश्रम करना पड़ रहा है। तुम्हारे श्रम के कष्ट को दूर करने एवं समय बिताने के लिए मैं तुम्हें एक कथा सुनाना चाहता हूं। किंतु कथा के दौरान तुम मौन ही रहना। यदि तुमने अपना मौन तोड़ा तो मैं तुम्हारी पकड़ से छूटकर पुनः अपने स्थान को लौट जाऊंगा। राजा द्वारा सहमति जताने पर बेताल ने उसे एक रोचक कथा सुनाई।
8 □ बेताल पच्चीसी
प्रथम बेताल: पद्मावती की कथा
प्रथम बेताल
पद्मावती की कथा कथा
आर्यावर्त्त में वाराणसी नाम की एक नगरी है, जहां भगवान शंकर निवास करते हैं। पुण्यात्मा लोगों के रहने के कारण वह नगरी कैलाश-भूमि के समान जान पड़ती है। उस नगरी के निकट अगाध जल वाली गंगा नदी बहती है जो उसके कंठहार की तरह सुशोभित होती है। प्राचीनकाल में उस नगरी मे एक राजा राज करता था, जिसका नाम था प्रताप मुकुट।
प्रताप मुकुट का वज्रमुकुकट नामक एक पुत्र था जो अपने पिता की ही भांति बहुत धीर, वीर और गंभीर था। वह इतना सुंदर था कि कामदेव का साक्षात् अवतार लगता था। राजा के एक मंत्री का बेटा बुद्धिशरीर उस वज्रमुकुट का घनिष्ठ मित्र था। एक बार वज्रमुकुट अपने उस मित्र के साथ जंगल में शिकार खेलने गया। वहां घने जंगल के बीच उसे एक रमणीक सरोवर दिखाई दिया, जिसमें बहुत-से कमल के सुंदर-सुंदर पुष्प खिले हुए थे। उसी समय अपनी कुछ सखियों सहित एक राजकन्या वहां आई और सरोवर में स्नान करने लगी। राजकन्या के सुंदर रूप को देखकर वज्रमुकुट उस पर मोहित हो गया। राजकन्या ने भी वज्रमुकुट को देख लिया था और वह भी पहली ही नजर में उसकी ओर आकृष्ट हो गई। राजकुमार वज्रमुकुट अभी उस राजकन्या के बारे में जानने के लिए सोच ही रहा था कि राजकन्या ने खेल-खेल में ही उसकी ओर संकेत करके अपना नाम-धाम भी बता दिया। उसने एक कमल के पत्ते को लेकर कान में लगाया, दंतपत्र से देर तक दांतों को खुरचा, एक दूसरा कमल माथे पर तथा हाथ अपने हृदय पर रखा। किंतु राजकुमार ने उस समय उसके इशारों का मतलब न समझा।
उसके बुद्धिमान मित्र बुद्धिशरीर ने उन इशारों का मतलब समझ लिया था, अतः मंद-मंद मुस्कराता हुआ अपने मित्र की हालत देखता रहा, जो उस राजकन्या के प्रेमबाण से आहत होकर, राजकन्या और उसकी सखियों को वापस जाते देख रहा था।
राजकुमार घर लौटा तो वह बहुत उदास था। उसकी दशा जल बिन-मछली की भांति हो रही थी। जब से वह शिकार से लौटा था, उस राजकन्या के वियोग में उसका खाना-पीना छूट गया था। राजकुमारी की याद आते ही उसका मन उसे पाने के लिए बेचैन होने लगता था।
एक दिन बुद्धिशरीर ने राजकुमार से एकान्त में इसका कारण पूछा। कारण जानकर उसने कहा कि उसका मिलना कठिन नहीं है। तब राजकुमार ने अधीरता से कहा—"जिसका न तो नाम-धाम मालूम है और न जिसके कुल का ही कोई पता है, वह भला कैसे पाई जा सकती है? फिर तुम व्यर्थ ही मुझे भरोसा क्यों दिलाते हो?"
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10 □ बेताल पच्चीसी
इस पर मंत्रीपुत्र बुद्धिशरीर बोला—‘‘मित्र, उसने तुम्हें इशारों से जो कुछ बताया था, क्या उन्हें तुमने नहीं देखा ? सुनो—उसने कानों पर उत्पल (कमल) रखकर बताया कि वह राजा कर्णोत्पल के राज्य में रहती है। दांतों को खुरचकर यह संकेत दिया कि वह वहां के दंतवैद्य की कन्या है। अपने कान में कमल का पत्ता लगाकर उसने अपना नाम पद्मावती बताया और हृदय पर हाथ रखकर सूचित किया कि उसका हृदय तुम्हें अर्पित हो चुका है। कलिंग देश में कर्णोत्पल नाम का एक सुविख्यात राजा है। उसके दरबार में दंतवैद्य की पद्मावती नाम की एक कन्या है जो उसे प्राणों से भी अधिक प्यारी है। दंतवैद्य उस पर अपनी जान छिड़कता है। ’’
मंत्रीपुत्र ने आगे बताया—‘‘मित्र, ये सारी बातें मैंने लोगों के मुख से सुन रखी थीं इसलिए मैंने उसके उन इशारों को समझ लिया, जिससे उसने अपने देश आदि की सूचना दी थी।’’
मंत्रीपुत्र के ऐसा कहने पर राजकुमार को बेहद संतोष हुआ। प्रिया का पता लगाने का उपाय मिल जाने के कारण वह प्रसन्न भी था। वह अपने मित्र के साथ अगले ही दिन आखेट का बहाना करके अपनी प्रिया से मिलने चल पड़ा। आधी राह में अपने घोड़े को वायु-वेग से दौड़ाकर उसने अपने सैनिकों को पीछे छोड़ दिया और केवल मंत्रीपुत्र के साथ कलिंग की ओर बढ़ चला।
राजा कर्णोत्पल के राज्य में पहुंचकर उसने दंतवैद्य की खोज की और उसका घर देख लिया। तब राजकुमार और मंत्रीपुत्र ने उसके घर के पास ही निवास करने के लिए, एक वृद्ध स्त्री के मकान में प्रवेश किया।
मंत्रीपुत्र ने घोड़ों को दाना-पानी देकर उन्हें छिपाकर बांध दिया, फिर राजकुमार के सामने ही उसने वृद्धा से कहा—‘‘हे माता, क्या आप संग्रामवर्धन नाम के किसी दंतवैद्य को जानती हैं ?’’
यह सुनकर उस वृद्धा स्त्री ने आश्चर्यपूर्वक कहा—‘‘हां, मैं जानती हूं। मै उनकी धाय हूं लेकिन अधिक उम्र हो जाने के कारण अब उन्होंने मुझे अपनी बेटी पद्मावती की सेवा में लगा दिया है। किंतु, वस्त्रों से हीन होने के कारण मैं सदा उसके पास नहीं जाती। मेरा बेटा नालायक और जुआरी है। मेरे वस्त्र देखते ही वह उन्हें उठा ले जाता है।’’
बुढ़िया के ऐसा कहने पर प्रसन्न होकर मंत्रीपुत्र ने अपने उत्तरीय आदि वस्त्र उसे देकर संतुष्ट किया। फिर वह बोला—‘‘तुम हमारी माता के समान हो। पुत्र समझकर हमारा एक कार्य गुप्त रूप से कर दो तो हम आपके बहुत आभारी रहेंगे। तुम इस दंतवैद्य की कन्या पद्मावती से जाकर कहो कि जिस राजकुमार को उसने सरोवर के किनारे देखा था, वह यहां आया हुआ है। प्रेमवश उसने यह संदेश कहने के लिए तुम्हें वहां भेजा है। ’’
उपहार मिलने की आशा में वह बुढ़िया तुरंत ऐसा करने को तैयार हो गई। वह
बेताल पच्चीसी ☐ 11
पद्मावती के पास पहुंची और वह संदेश पद्मावती को देकर शीघ्रता से लौट आई।
पूछने पर उसने राजकुमार और मंत्रीपुत्र को बताया—‘‘मैंने जाकर तुम लोगों के आने की बात गुप्त रूप से उससे कही। सुनकर उसने मुझे बहुत बुरा-भला कहा और कपूर लगे अपने दोनों हाथों से मेरे दोनों गालों पर कई थप्पड़ मारे। मैं इस अपमान को सहन न कर सकी और दुखी होकर रोती हुई वहा से लौट आई। बेटे, स्वयं अपनी आंखों से देख लो, मेरे दोनों गालों पर अभी भी उसके द्वारा मारे गए थप्पड़ों के निशान मौजूद हैं।’’
बुढ़िया द्वारा बताए जाने पर राजकुमार उदास हो गया किंतु महाबुद्धिमान मंत्रीपुत्र ने उससे एकांत में कहा—‘‘तुम दुखी मत हो मित्र। पद्मावती ने बुढ़िया को फटकारकर, कपूर से उजली अपनी दसों उंगलियों की छाप द्वारा तुम्हें ये बताने की कोशिश की है कि तुम शुक्लपक्ष की दस चांदनी रातों तक प्रतीक्षा करो। ये रातें मिलन के लिए उपयुक्त नहीं हैं।’’
इस तरह राजकुमार को आश्वासन देकर मंत्रीपुत्र बाजार में गया और अपने पास का थोड़ा-सा सोना बेच आया। उससे मिले धन से उसने बुढ़िया से उत्तम भोजन तैयार करवाया और उस वृद्धा के साथ ही भोजन किया।
इस तरह दस दिन बिताकर मंत्रीपुत्र ने उस बुढ़िया को फिर पद्मावती के पास भेज दिया। बुढ़िया उत्तम भोजन के लोभ में यह कार्य करने के लिए फिर से तैयार हो गई।
बुढ़िया ने लौटकर उन्हें बताया—‘‘आज मैं यहां से जाकर, चुपचाप उसके पास खड़ी रही। तब उसने स्वयं ही तुम्हारी बात कहने के लिए मेरे अपराध का उल्लेख करते हुए मेरे हृदय पर महावर लगी अपनी तीन उंगलियों से आघात किया। इसके बाद मैं उसके पास से यहां चली आई।’’
तीन रातें बीत जाने के बाद मंत्रीपुत्र ने अकेले में राजकुमार से कहा—‘‘तुम कोई शंका मत करो, मित्र। पद्मावती ने महावर लगी तीन उंगलियों की छाप छोड़कर यह सूचित किया है कि वह अभी तीन दिन तक राजमहल में रहेगी।’’
यह सुनकर मंत्रीपुत्र ने फिर से बुढ़िया को पद्मावती के पास भेजा। उस दिन जब बुढ़िया पद्मावती के पास पहुंची तो उसने बुढ़िया का उचित स्वागत-सत्कार किया और उसे स्वादिष्ट भोजन भी कराया। पूरा दिन वह बुढ़िया के साथ हंसती-मुस्कराती बातें करती रही। शाम को जब बुढ़िया लौटने को हुई, तभी बाहर बहुत डरावना शोर-गुल सुनाई दिया—‘‘हाय-हाय, यह पागल हाथी जंजीरें तोड़कर लोगों को कुचलता हुआ भागा जा रहा है।’’ बाहर से मनुष्यों की ऐसी चीख-पुकार सुनाई पड़ीं।
तब पद्मावती ने उस बुढ़िया से कहा—‘‘राजमार्ग को एक हाथी ने रोक रखा है। उससे तुम्हारा जाना उचित नहीं है। मैं तुम्हें रस्सियों से बंधी एक पीढ़ी पर बैठाकर उस बड़ी खिड़की के रास्ते नीचे बगीचे में उतरवा देती हूं। उसके बाद तुम
12 ▢ बेताल पच्चीसी
पेड़ के सहारे बाग की चारदीवारी पर चढ़ जाना और फिर वहां से दूसरी ओर के पेड़ पर चढ़कर नीचे उतर जाना। फिर वहां से अपने घर चली जाना। '' यह कहकर एक रस्सी से बंधी पीढ़ी पर बैठाकर उसने बुढ़िया को अपनी दासियों द्वारा खिड़की के रास्ते नीचे बगीचे में उतरवा दिया। बुढ़िया पद्मावती द्वारा बताए हुए उपाय से घर लौट आई और सारी बातें ज्यों-की-त्यों राजकुमार और मंत्रीपुत्र को बता दीं।
तब उस मंत्रीपुत्र ने राजकुमार से कहा—‘‘मित्र, तुम्हारा मनोरथ पूरा हुआ। उसने युक्तिपूर्वक तुम्हें रास्ता भी बतला दिया है इसलिए आज ही शाम को तुम वहां जाओ और इसी मार्ग से अपनी उस प्रिया के भवन में प्रवेश करो। ''
राजकुमार ने वैसा ही किया। बुढ़िया के बताए हुए तरीके द्वारा वह चारदीवारी पर चढ़कर पद्मावती के बगीचे में पहुंच गया। वहां उसने रस्सियों से बंधी हुई पीढ़ी को लटकते देखा, जिसके ऊपरी छज्जे पर राजकुमार की राह देखती हुई कई दासियां खड़ी थीं। ज्योंही राजकुमार पीढ़ी पर बैठा, दासियों ने रस्सी ऊपर खींच ली और वह खिड़की की राह से अपनी प्रिया के पास जा पहुंचा। मंत्रीपुत्र ने जब अपने मित्र को निर्विघ्न खिड़की में प्रवेश करते देखा तो वह संतुष्ट होकर वहां से लौट गया।
अंदर पहुंचकर राजकुमार ने अपनी प्रिया को देखा। पद्मावती का मुख पूर्णचंद्र के समान था जिससे शोभा की किरणें छिटक रही थीं। पद्मावती भी उत्कंठा से भरी राजकुमार के अंग लग गई और अनेक प्रकार से उसका सम्मान करने लगी।
अनन्तर, राजकुमार ने गांधर्व-विधि से पद्मावती के साथ विवाह रचा लिया और कई दिन तक गुप्त-रूप से उसी के आवास में छिपा रहा। कई दिनों तक वहां रहने के बाद, एक रात को उसने अपनी प्रिया से कहा—‘‘मेरे साथ मेरा मित्र बुद्धिशरीर भी यहां आया है। वह यहां अकेला ही तुम्हारी धाय के घर में रहता है। मैं अभी जाता हूं, उसकी कुशलता का पता करके और उसे समझा-बुझाकर पुनः तुम्हारे पास आ जाऊंगा। ''
यह सुनकर पद्मावती ने राजकुमार से कहा—‘‘आर्यपुत्र, यह तो बतलाइए कि मैंने जो इशारे किए थे, उन्हें तुमने समझा था या बुद्धिशरीर ने ?’’
‘‘मैं तो तुम्हारे इशारे बिल्कुल भी नहीं समझा था। '' राजकुमार से बताया—‘‘उन इशारों को मेरे मित्र बुद्धिशरीर ने ही समझकर मुझे बताया था।
यह सुनकर और कुछ सोचकर पद्मावती ने राजकुमार से कहा—‘‘यह बात इतने विलम्ब से कहकर आपने बहुत अनुचित कार्य किया है। आपका मित्र होने के कारण वह मेरा भाई है। पान-पत्तों से मुझे पहले उसका ही स्वागत-सत्कार करना चाहिए था। ''
ऐसा कहकर उसने राजकुमार को जाने की अनुमति दे दी। तब, रात के समय राजकुमार जिस रास्ते से आया था, उसी से अपने मित्र के पास गया।
पद्मावती से, उसके इशारे समझाने के बारे में राजकुमार को जो बातें हुई थीं,
बेताल पच्चीसी ❑ 13
बात बातों-बातों में वह सब भी उसने मंत्रीपुत्र को कह सुनाई। मंत्रीपुत्र ने अपने संबंध में कही गई इस बात को उचित न समझकर इसका समर्थन नहीं किया। इसी बीच रात बीत गई।
सवेरे संध्या-वंदन आदि से निवृत्त होकर दोनों बातें कर रहे थे, तभी पद्मावती की एक सखी हाथ में पान और पकवान लेकर वहां आई। उसने मंत्रीपुत्र का कुशल-मंगल पूछा और लाई हुई चीजें उसे दे दीं। बातों-बातों में उसने राजकुमार से कहा कि उसकी स्वामिनी भोजन आदि के लिए उसकी प्रतीक्षा कर रही है। पल-भर बाद, वह गुप्त रूप से वहां से चली गई। तब मंत्रीपुत्र ने राजकुमार से कहा—‘‘मित्र, अब देखिए, मैं आपको एक तमाशा दिखाता हूं।‘’
यह कहकर उसने एक कुत्ते के सामने वह भोजन डाल दिया। कुत्ता वह पकवान खाते ही तड़प-तड़पकर मर गया। यह देखकर आश्चर्यचकित हुए राजकुमार ने मंत्रीपुत्र से पूछा—‘‘मित्र, यह कैसा कौतुक है ?’’
तब मंत्रीपुत्र ने कहा—‘‘मैंने उसके इशारों को पहचान लिया था इसलिए मुझे धूर्त समझकर उसने मेरी हत्या कर देनी चाही थी। इसी से, तुममें बहुत अनुराग होने के कारण उसने मेरे लिए विष मिश्रित पकवान भेजे थे। उसे भय था कि मेरे रहते राजकुमार एकमात्र उसी में अनुराग नहीं रख सकेगा और उसके वश में रहकर, उसे छोड़कर अपनी नगरी में चला जाएगा। इसलिए उस पर क्रोध न करो बल्कि उसे अपने माता-पिता के त्याग के लिए प्रेरित करो और सोच-विचार उसके हरण के लिए मैं तुम्हें जो युक्ति बतलाता हूं, उसके अनुसार आचरण करो।‘’
मंत्रीपुत्र के ऐसा कहने पर राजकुमार यह कहकर उसकी प्रशंसा करने लगा कि—‘‘सचमुच तुम बुद्धिमान हो।‘’ इसी बीच अचानक बाहर से दुख से विकल लोगों का शोरगुल सुनाई पड़ा, जो कह रहे थे—‘‘हाय-हाय, राजा का छोटा बच्चा मर गया।‘’
यह सुनकर मंत्रीपुत्र प्रसन्न हुआ। उसने राजकुमार से कहा—‘‘आज रात को तुम पद्मावती के घर जाओ। वहां तुम उसे इतनी मदिरा पिलाना कि वह बेहोश हो जाए, और वह किसी मृतक के समान जान पड़े। जब वह बेहोश हो तो उस हालत में तुम एक त्रिशूल गर्म करके उसकी जांघ पर दाग देना और उसके गहनों की गठरी बांधकर रस्सी के सहारे, खिड़की के रास्ते से यहां चले आना। उसके बाद मैं सोच-विचारकर कोई वैसा उपाय करूंगा जो हमारे लिए कल्याणकारी हो।‘’
राजकुमार ने वैसा ही किया। उसने पद्मावती को जी-भरकर मदिरा पिलाई और जब वह बेहोश हो गई तो उसकी जांघ पर त्रिशूल से एक बड़ा-सा दाग बना दिया और उसके गहनों की गठरी बनाकर अपने साथ ले आया।
सवेरे श्मशान में जाकर मंत्रीपुत्र ने तपस्वी का रूप धारण किया और राजकुमार को अपना शिष्य बनाकर उससे कहा—‘‘अब तुम इन आभूषणों में से मोतियों का हार लेकर बाजार में बेचने के लिए जाओ, लेकिन इसका दाम इतना अधिक बताना
14 ❒ बेताल पच्चीसी
कि इसे कोई खरीद न सके, साथ ही यह भी प्रयत्न करो कि इसे लेकर घूमते हुए तुम्हें अधिक-से-अधिक लोग देखें। अगर नगररक्षक तुम्हें पकड़ें, तो बिना घबराए हुए तुम कहना कि—"मेरे गुरु ने इसे बेचने के लिए मुझे दिया है।"
तब राजकुमार बाजार में गया और वहां उस हार को लेकर घूमता रहा।
उधर दंतवैद्य की बेटी के गहनों की चोरी की खबर पाकर, नगररक्षक उसका पता लगाने के लिए घूमते फिर रहे थे। राजकुमार को हार के साथ देखकर उन लोगों ने उसे पकड़ लिया।
नगररक्षक राजकुमार को नगरपाल के पास ले गए। उसने तपस्वी के वेश में राजकुमार को देखकर आदर सहित पूछा—"भगवन्, मोतियों का यह हार आपको कहां से मिला ? पिछले दिनों दंतवैद्य की कन्या के आभूषण चोरी हो गए थे जिनमें इस हार का भी जिक्र था।"
इस पर तपस्वी-शिष्य बना राजकुमार बोला—"इसे मेरे गुरु ने बेचने के लिए मुझे दिया है। आप उन्हीं से पूछ लीजिए।"
तब नगरपाल वहां आया तो तपस्वी रूपी मंत्रीपुत्र ने कहा—"मैं तो तपस्वी हूं। सदा जंगलों में यहां-वहां घूमता रहता हूं। संयोग से मैं पिछली रात इस श्मशान में आकर टिक गया था। यहां मैंने इधर-उधर से आई हुई योगिनियों को देखा। उनमें से एक योगिनी राजपुत्र को ले आई और उसने उसका हृदय निकालकर भैरव को अर्पित कर दिया। मदिरा पीकर वह मायाविनी मतवाली हो गई और मुझे मुंह चिढ़ाकर, मेरी उस रुद्राक्ष माला को लेने दौड़ी जिसके मनकों के साथ मैं तप कर रहा था। जब उसने मुझे बहुत तंग किया तो मुझे उस पर क्रोध आ गया। मैंने मंत्रबल से अग्नि जलाई और उसमें त्रिशूल तपाकर उसकी जंघा पर दाग दिया। उसी समय मैंने उसके गले से यह मोतियों का हार खींच लिया था। अब मैं ठहरा तपस्वी, यह हार मेरे किसी काम का नहीं है इसलिए मैंने अपने शिष्य को इसे बेचने के लिए भेज दिया था।"
यह सुनकर नगरपाल राजा के पास पहुंचा और उसने राजा से सारा वृत्तांत कह सुनाया। राजा ने बात सुनकर उस मोतियों के हार को पहचान दिया। पहचानने का कारण यह था कि वह हार स्वयं राजा ने ही दंतवैद्य की बेटी को उपहार स्वरूप भेंट किया था।
तब राजा ने अपनी एक विश्वासपात्र वृद्धा दासी को यह जांच करने के लिए दंतवैद्य के यहां भेजा कि वह पद्मावती के शरीर का परीक्षण कर यह पता करे कि उसकी जांघ पर त्रिशूल का चिन्ह है या नहीं। वृद्धा दासी ने जांच करके राजा को बताया कि उसने पद्मावती की जांघ पर वैसा ही एक दाग देखा है। इस पर राजा को विश्वास हो गया कि पद्मावती ही उसके बेटे को मारकर खा गई है। तब वह स्वयं तपस्वी-वेशधारी मंत्रीपुत्र के पास गए और पूछा कि पद्मावती को क्या दंड
बेताल पच्चीसी ❑ 15
दिया जाए। मंत्रीपुत्र के कहने पर राजा ने पद्मावती को नग्नावस्था मे अपने राज्य सं निर्वासित कर दिया।
नग्न करके वन में निर्वासित कर दिए जाने पर भी पद्मावती ने आत्महत्या नहीं की। उसने सोचा कि मंत्रीपुत्र ने ही यह सब उपाय किया है। शाम होने पर तपस्वी का वेश त्यागकर राजकुमार और मंत्रीपुत्र, घोड़ों पर सवार होकर वहां पहुंचे जहां पद्मावती शोकमग्न बैठी थी। वे उसे समझा-बुझाकर घोड़े पर बैठाकर अपने देश ले गए। वहां राजकुमार उसके साथ सुखपूर्वक रहने लगा।
बेताल ने इतनी कथा सुनाकर राजा विक्रमादित्य से पूछा—‘‘राजन ! आप बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, अतः मुझे यह बताइए कि यदि राजा क्रोधवश उस समय पद्मावती-को नगर निर्वासन का आदेश न देकर उसे मारने का आदेश दे देता...अथवा पहचान लिए जाने पर वह राजकुमार का ही वध करवा देता तो इन पति-पत्नी के वध का पाप किसे लगता ? मंत्रीपुत्र को, राजकुमार को अथवा पद्मावती को ? राजन, यदि जानते हुए भी तुम मुझे ठीक-ठीक नहीं बतलाओगे तो विश्वास जानो कि तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे।’’
बेताल के ऐसा कहने पर सब-कुछ जानते हुए भी राजा विक्रमादित्य ने शाप के भय से उससे यों कहा—‘‘योगेश्वर, इसमें न जानने योग्य क्या है ? इसमें इन तीनों का कोई पाप नहीं है। जो पाप है वह राजा कर्णीत्पल का है।’’
बेताल बोला—‘‘इसमें राजा का पाप क्या है ? जो कुछ किया, वह तो उन तीनों ने किया। हंस यदि चावल खा जाएं तो इसमें कौओं का क्या अपराध है ?’’
तब विक्रमादित्य बोला—‘‘उन तीनों का कोई दोष नहीं था। पद्मावती और राजकुमार कामाग्नि में जल रहे थे, वे अपने स्वार्थ साधन में लगे हुए थे। अतः वे भी निर्दोष थे। उनका विचार नहीं करना चाहिए लेकिन राजा कर्णीत्पाल अवश्य पाप का भागी था। राजा होकर भी वह नीतिशास्त्र नहीं जानता था। उसने अपने गुप्तचरों के द्वारा अपनी प्रजा से भी सच-झूठ का पता नहीं लगवाया। वह धूर्तों के चरित्र को नहीं जानता था। फिर भी बिना विचारे उसने जो कुछ किया, उसके लिए वह पाप का भागी हुआ।’’
शव के अंदर प्रविष्ट उस बेताल से, जब राजा ने मौन छोड़कर ऐसी युक्तियुक्त बातें कहीं, तब उनकी दृढ़ता की परीक्षा लेने के लिए अपनी माया के प्रभाव से वह राजा विक्रमादित्य के कंधे से उतरकर इस तरह कहीं चला गया कि राजा को पता भी नहीं चला। फिर भी राजा घबराया नहीं, राजा ने उसे फिर से ढूंढ निकालने का निश्चय किया और वापस उसी वृक्ष की ओर लौट पड़ा।
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16 ◻ बेताल पच्चीसी \hfill बेताल पच्चीसी—1
द्वितीय बेताल: तीन तरुण ब्राह्मणों की कथा
द्वितीय बेताल तीन तरुण ब्राह्मणों की कथा
महाराज विक्रमादित्य पुनः उसी शिंशपा-वृक्ष के नीचे पहुंचे। वहां चिता की मटमैली रोशनी में उनकी नजर भूमि पर पड़े उस शव पर पड़ी जो धीरे-धीरे कराह रहा था।
उन्होंने शव को उठाकर कंधे पर डाला और चुपचाप उसे उठाए तेज गति से लौट पड़े।
कुछ आगे चलने पर शव के अंदर से बेताल की आवाज आई—‘‘राजन ! तुम अत्यंत अनुचित क्लेश में पड़ गए, अतः तुम्हारे मनोरंजन के लिए मैं एक कहानी सुनाता हूं, सुनो।’’
यमुना किनारे ब्रह्मस्थल नाम का एक स्थान है, जो ब्राह्मणों को दान में मिला हुआ था। वहां वेदों का ज्ञाता अग्निस्वामी नाम का एक ब्राह्मण था। उसके यहां मन्दरावती नाम की एक अत्यंत रूपवती कन्या उत्पन्न हुई। जब वह कन्या युवती हुई, तब तीन कान्यकुब्ज ब्राह्मण कुमार वहां आए जो समान भाव से समस्त गुणों से अलंकृत थे।
उन तीनों ने ही उसके पिता से अपने लिए कन्या की याचना की। किंतु कन्या के पिता ने उनमें से किसी के भी साथ कन्या का विवाह करना स्वीकार नहीं किया क्योंकि उसे भय हुआ कि ऐसा करने पर वे तीनों आपस में ही लड़ मरेंगे। इस तरह वह कन्या कुआंरी ही रही।
वे तीनों ब्राह्मण कुमार भी चकोर का व्रत लेकर उसके मुखमंडल पर टकटकी लगाए रात-दिन वहीं रहने लगे।
एक बार मंदारवती को अचानक दाह-ज्वर हो गया और उसी अवस्था में उसकी मौत हो गई। उसके मर जाने पर तीनों ब्राह्मण कुमार शोक से बड़े विकल हुए और उसे सजा-संवारकर श्मशान ले गए, जहां उसका दाह-संस्कार किया।
उनमें से एक ने वहीं अपनी एक छोटी-सी मढ़ैया बना ली और मंदारवती की चिता की भस्म अपने सिराहने रखकर एवं भीख में प्राप्त अन्न पर निर्वाह करता हुआ वहीं रहने लगा।
दूसरा उसकी अस्थियों की भस्म लेकर गंगा-तट पर चला गया और तीसरा योगी बनकर देश-देशांतरों के भ्रमण के लिए निकल पड़ा।
योगी बना वह ब्राह्मण घूमता-फिरता एक दिन वज्रोलक नाम के गांव में जा पहुंचा। वहां अतिथि के रूप में उसने एक ब्राह्मण के घर में प्रवेश किया। ब्राह्मण
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(इस पृष्ठ पर केवल चित्र है, कोई लिखित पाठ उपलब्ध नहीं है।)
द्वारा सम्मानित होकर जब वह भोजन करने बैठा, तो उसी समय एक बालक ने जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया। बहुत बहलाने-समझाने पर भी जब बालक चुप न हुआ तो घर की मालकिन ने क्रुद्ध होकर उसे हाथों में उठा लिया और जलती हुई अग्नि में फेंक दिया। आग में गिरते ही, कोमल शरीर वाला वह बालक जलकर राख हो गया। यह देखकर उस योगी को रोमांच हो आया। उसने परोसे हुए भोजन को आगे सरका दिया और उठकर खड़ा होते हुए क्रोधित भाव में बोला—‘‘धिक्कार है आप लोगों पर। आप ब्राह्मण नहीं, कोई ब्रह्म-राक्षस हैं। अब मैं तुम्हारे घर का भोजन तो क्या, एक अन्न का दाना भी ग्रहण नहीं करूंगा। ’’
योगी के ऐसा कहने पर गृहस्वामी बोला—‘‘हे योगिराज, आप कुपित न हों। मैं बच्चे को फिर से जीवित कर लूंगा। मैं एक ऐसा मंत्र जानता हूं जिसके पढ़ने से मृत व्यक्ति जीवित हो जाता है। ’’
यह कहकर वह गृहस्थ, एक पुस्तक ले आया जिसमें मंत्र लिखा था। उसने मंत्र पढ़कर उससे अभिमंत्रित धूल आग में डाल दी। आग में धूल के पड़ते ही वह बालक जीवित होकर ज्यों-का-त्यों आग से निकल आया।
जब उस ब्राह्मण योगी का चित्त शांत हो गया तो उसने भोजन ग्रहण किया। गृहस्थ ने उस पुस्तिका को बांधकर खूंटी पर टांग दिया और भोजन करके योगी के साथ वहीं सो गया। गृहपति के सो जाने के पश्चात् वह योगी चुपचाप उठा और अपनी प्रिया को जीवित करने की इच्छा से उसने डरते-डरते वह पुस्तक खूंटी से उतार ली और चुपचाप बाहर निकल आया।
रात-दिन चलता हुआ, वह योगी उस जगह पहुंचा, जहां उसकी प्रिया का दाह हुआ था। वहां पहुंचते ही उसने उस दूसरे ब्राह्मण को देखा जो मंदारवती की अस्थियां लेकर गंगा में डालने गया था।
तब उस योगी ने उससे तथा उस पहले ब्राह्मण से, जिसने वहां कुटिया बना ली थी और चिता-भस्म से सेज रच रखी थी कहा कि—‘‘तुम यह कुटिया यहां से हटा लो जिससे मैं एक मंत्र शक्ति के द्वारा इस भस्म हुई मदारवती को जीवित करके उठा लूं। ’’
इस प्रकार उन्हें बहुत समझा-बुझाकर उसने वह कुटिया उजाड़ डाली। तब वह योगी पुस्तक खोलकर मंत्र पढ़ने लगा। उसने धूल को अभिमंत्रित करके चिता-भस्म में डाल दिया और मंदारवती उसमें से जीती-जागती निकल आई। अग्नि में प्रवेश करके निकलते हुए उसके शरीर की कांति पहले से भी अधिक तेज हो गई थी। उसका शरीर अब ऐसा लगने लगा था जैसे वह सोने का बना हुआ हो। इस प्रकार उसको जीवित देखकर वे तीनों ही काम-पीड़ित हो गए और उसको पाने के लिए आपस में लड़ने-झगड़ने लगे। जिस योगी ने मत्र से उसे जीवित किया था वह बोला कि वह स्त्री उसकी है। उसने उसे मंत्र-तंत्र से प्राप्त किया है। दूसरे ने कहा कि तीर्थों के प्रभाव से मिली वह उसकी भार्या है। तीसरा बोला कि उसकी भस्म को रखकर
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अपनी तपस्या से उसने उसे जीवित किया है, अतः उस पर उसका ही अधिकार है।
इतनी कहानी सुनाकर बेताल ने विक्रमादित्य से कहा—"राजन ! उनके इस विवाद का निर्णय करके तुम ठीक-ठीक बताओ कि वह स्त्री किसकी होनी चाहिए ? यदि तुम जानते हुए भी न बतला पाए तो तुम्हारा सिर फटकर अनेक टुकड़ों में बंट जाएगा।"
बेताल द्वारा कहे हुए शब्दों को सुनकर राजा विक्रमादित्य ने कहा—'हे बेताल ! जिस योगी ने कष्ट उठाकर भी, मंत्र-तंत्र से उसे जीवित किया, वह तो उसका पिता हुआ। ऐसा काम करने के कारण उसे पति नहीं होना चाहिए और जो ब्राह्मण उसकी अस्थियां गंगा में डाल आया था, उसे स्वयं को उस स्त्री का पुत्र समझना चाहिए। किंतु, जो उसकी भस्म की शैय्या पर आलिंगन करते हुए तपस्या करता रहा और श्मशान में ही बना रहा, उसे ही उसका पति कहना चाहिए, क्योंकि गाढ़ी प्रीति वाले उस ब्राह्मण ने ही पति के समान आचरण किया था।"
"तूने ठीक उत्तर दिया राजा किंतु ऐसा करके तूने अपना मौन भंग कर दिया। इसलिए मै चला वापस अपने स्थान पर।" यह कहकर बेताल उसके कंधे से उतरकर लोप हो गया।
राजा ने भिक्षु के पास ले जाने के लिए, उसे फिर से पाने के लिए कमर कसी क्योंकि धीर वृत्ति वाले लोग प्राण देकर भी अपने दिए हुए वचन की रक्षा करते हैं। तब राजा फिर से उसी स्थान की ओर लौट पड़ा जहां से वह शव को उतारकर लाया था।
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20 ❑ बेताल पच्चीसी
तृतीय बेताल: शुक-सारिका की कथा
तृतीय बेताल
शुक-सारिका की कथा
शिंशपा-वृक्ष पर चढ़कर विक्रमादित्य ने फिर बेताल को उतारा और उसे कंधे पर डालकर चुपचाप भिक्षु की ओर चल पड़ा। कुछ आगे चलने पर शव में बैठा बेताल फिर से बोला—‘‘राजन, रात के समय इस भयानक श्मशान में आते-जाते तुम घबरा नहीं रहे हो, यह आश्चर्य की बात है। लो, तुम्हारे जी बहलाने के लिए मै तुम्हें फिर एक कथा सुनाता हूं।’’
पाटलीपुत्र नाम का एक जगत-विख्यात नगर है। प्राचीन काल में वहां विक्रम केसरी नाम का एक राजा था, जिसके पास ऐश्वर्य के सारे सामान मौजूद थे। उसका खजाना बहुमूल्य रत्नों से सदैव ही भरा रहता था। उसके पास एक शुक (तोता) था जिसने श्राप के कारण यह जन्म पाया था। वह तोता समस्त शास्त्रों का ज्ञाता और दिव्य ज्ञान से युक्त था। उस तोते का नाम था—विदग्धचूड़ामरिन।
उस तोते के परामर्श से राजा ने अपने समान कुल वाली मगध की राजकुमारी चंद्रप्रभा से विवाह किया। उस राजकुमारी के पास भी सोमिका नाम की एक वैसी ही सारिका (मैना) थी जो समस्त विज्ञानों को जानने वाली थी। वे दोनों तोता-मैना अपने बुद्धिबल से अपने स्वामियों (पति-पली) की सेवा करते हुए, वहां एक ही पिंजरे में रहते थे। एक दिन उत्कंठित होकर उस तोते ने मैना से कहा—‘‘सुभगे, तुम मेरे साथ एक सेज पर सोओ, एक आसन पर बैठो, एक साथ भोजन करो और हमेशा के लिए मेरी ही हो जाओ।’’
मैना बोली—‘‘मैं पुरुष जाति का संसर्ग नहीं चाहती, क्योंकि वे दुष्ट और कृतघ्न होते हैं।’’
मैना की बात सुनकर तोता बहुत आहत हुआ। उसके स्वाभिमान को ठेस पहुची। वह बोला—‘‘तुम्हारा यह कथन बिल्कुल मिथ्या है, मैना। पुरुष दुष्ट नहीं होते, दुष्टा तो स्त्रियां होती हैं और वे क्रूर हृदय वाली भी होती हैं।’’
तोते की बात पर दोनों में झगड़ा पैदा हो गया। तब उन दोनों ने शर्त लगाई कि यदि मैना झूठी हो तो वह तोते से विवाह कर लेगी और यदि तोते की बात गलत निकले तो वह मैना का दास बन जाएगा। निर्णय के लिए वे दोनों राजसभा में बैठे हुए राजपुत्र के पास गए।
अपने पिता के न्यायालय में बैठे हुए राजपुत्र ने जब उन दोनों के झगड़े का वृत्तांत सुना, तब उसने मैना से कहा—‘‘सारिका, पहले तुम यह बतलाओ कि पुरुष किस प्रकार कृतघ्न होते हैं?’’
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