बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय बेताल
शुक-सारिका की कथा
शिंशपा-वृक्ष पर चढ़कर विक्रमादित्य ने फिर बेताल को उतारा और उसे कंधे पर डालकर चुपचाप भिक्षु की ओर चल पड़ा। कुछ आगे चलने पर शव में बैठा बेताल फिर से बोला—‘‘राजन, रात के समय इस भयानक श्मशान में आते-जाते तुम घबरा नहीं रहे हो, यह आश्चर्य की बात है। लो, तुम्हारे जी बहलाने के लिए मै तुम्हें फिर एक कथा सुनाता हूं।’’
पाटलीपुत्र नाम का एक जगत-विख्यात नगर है। प्राचीन काल में वहां विक्रम केसरी नाम का एक राजा था, जिसके पास ऐश्वर्य के सारे सामान मौजूद थे। उसका खजाना बहुमूल्य रत्नों से सदैव ही भरा रहता था। उसके पास एक शुक (तोता) था जिसने श्राप के कारण यह जन्म पाया था। वह तोता समस्त शास्त्रों का ज्ञाता और दिव्य ज्ञान से युक्त था। उस तोते का नाम था—विदग्धचूड़ामरिन।
उस तोते के परामर्श से राजा ने अपने समान कुल वाली मगध की राजकुमारी चंद्रप्रभा से विवाह किया। उस राजकुमारी के पास भी सोमिका नाम की एक वैसी ही सारिका (मैना) थी जो समस्त विज्ञानों को जानने वाली थी। वे दोनों तोता-मैना अपने बुद्धिबल से अपने स्वामियों (पति-पली) की सेवा करते हुए, वहां एक ही पिंजरे में रहते थे। एक दिन उत्कंठित होकर उस तोते ने मैना से कहा—‘‘सुभगे, तुम मेरे साथ एक सेज पर सोओ, एक आसन पर बैठो, एक साथ भोजन करो और हमेशा के लिए मेरी ही हो जाओ।’’
मैना बोली—‘‘मैं पुरुष जाति का संसर्ग नहीं चाहती, क्योंकि वे दुष्ट और कृतघ्न होते हैं।’’
मैना की बात सुनकर तोता बहुत आहत हुआ। उसके स्वाभिमान को ठेस पहुची। वह बोला—‘‘तुम्हारा यह कथन बिल्कुल मिथ्या है, मैना। पुरुष दुष्ट नहीं होते, दुष्टा तो स्त्रियां होती हैं और वे क्रूर हृदय वाली भी होती हैं।’’
तोते की बात पर दोनों में झगड़ा पैदा हो गया। तब उन दोनों ने शर्त लगाई कि यदि मैना झूठी हो तो वह तोते से विवाह कर लेगी और यदि तोते की बात गलत निकले तो वह मैना का दास बन जाएगा। निर्णय के लिए वे दोनों राजसभा में बैठे हुए राजपुत्र के पास गए।
अपने पिता के न्यायालय में बैठे हुए राजपुत्र ने जब उन दोनों के झगड़े का वृत्तांत सुना, तब उसने मैना से कहा—‘‘सारिका, पहले तुम यह बतलाओ कि पुरुष किस प्रकार कृतघ्न होते हैं?’’
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