बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट
Page 12 of 151
Read in contextपेड़ के सहारे बाग की चारदीवारी पर चढ़ जाना और फिर वहां से दूसरी ओर के पेड़ पर चढ़कर नीचे उतर जाना। फिर वहां से अपने घर चली जाना। '' यह कहकर एक रस्सी से बंधी पीढ़ी पर बैठाकर उसने बुढ़िया को अपनी दासियों द्वारा खिड़की के रास्ते नीचे बगीचे में उतरवा दिया। बुढ़िया पद्मावती द्वारा बताए हुए उपाय से घर लौट आई और सारी बातें ज्यों-की-त्यों राजकुमार और मंत्रीपुत्र को बता दीं।
तब उस मंत्रीपुत्र ने राजकुमार से कहा—‘‘मित्र, तुम्हारा मनोरथ पूरा हुआ। उसने युक्तिपूर्वक तुम्हें रास्ता भी बतला दिया है इसलिए आज ही शाम को तुम वहां जाओ और इसी मार्ग से अपनी उस प्रिया के भवन में प्रवेश करो। ''
राजकुमार ने वैसा ही किया। बुढ़िया के बताए हुए तरीके द्वारा वह चारदीवारी पर चढ़कर पद्मावती के बगीचे में पहुंच गया। वहां उसने रस्सियों से बंधी हुई पीढ़ी को लटकते देखा, जिसके ऊपरी छज्जे पर राजकुमार की राह देखती हुई कई दासियां खड़ी थीं। ज्योंही राजकुमार पीढ़ी पर बैठा, दासियों ने रस्सी ऊपर खींच ली और वह खिड़की की राह से अपनी प्रिया के पास जा पहुंचा। मंत्रीपुत्र ने जब अपने मित्र को निर्विघ्न खिड़की में प्रवेश करते देखा तो वह संतुष्ट होकर वहां से लौट गया।
अंदर पहुंचकर राजकुमार ने अपनी प्रिया को देखा। पद्मावती का मुख पूर्णचंद्र के समान था जिससे शोभा की किरणें छिटक रही थीं। पद्मावती भी उत्कंठा से भरी राजकुमार के अंग लग गई और अनेक प्रकार से उसका सम्मान करने लगी।
अनन्तर, राजकुमार ने गांधर्व-विधि से पद्मावती के साथ विवाह रचा लिया और कई दिन तक गुप्त-रूप से उसी के आवास में छिपा रहा। कई दिनों तक वहां रहने के बाद, एक रात को उसने अपनी प्रिया से कहा—‘‘मेरे साथ मेरा मित्र बुद्धिशरीर भी यहां आया है। वह यहां अकेला ही तुम्हारी धाय के घर में रहता है। मैं अभी जाता हूं, उसकी कुशलता का पता करके और उसे समझा-बुझाकर पुनः तुम्हारे पास आ जाऊंगा। ''
यह सुनकर पद्मावती ने राजकुमार से कहा—‘‘आर्यपुत्र, यह तो बतलाइए कि मैंने जो इशारे किए थे, उन्हें तुमने समझा था या बुद्धिशरीर ने ?’’
‘‘मैं तो तुम्हारे इशारे बिल्कुल भी नहीं समझा था। '' राजकुमार से बताया—‘‘उन इशारों को मेरे मित्र बुद्धिशरीर ने ही समझकर मुझे बताया था।
यह सुनकर और कुछ सोचकर पद्मावती ने राजकुमार से कहा—‘‘यह बात इतने विलम्ब से कहकर आपने बहुत अनुचित कार्य किया है। आपका मित्र होने के कारण वह मेरा भाई है। पान-पत्तों से मुझे पहले उसका ही स्वागत-सत्कार करना चाहिए था। ''
ऐसा कहकर उसने राजकुमार को जाने की अनुमति दे दी। तब, रात के समय राजकुमार जिस रास्ते से आया था, उसी से अपने मित्र के पास गया।
पद्मावती से, उसके इशारे समझाने के बारे में राजकुमार को जो बातें हुई थीं,
बेताल पच्चीसी ❑ 13