बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट
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Read in contextउसके हाथ-पैरों में छत्र, ध्वज आदि के चिन्हों की रेखाएं थीं। वह बालक बहुत ही सुंदर आकृति वाला था।
“भगवान शिव ने मेरे योग्य पुत्र ही मुझे दिया है।” ऐसा कहते हुए राजा ने उस बालक को अपने हाथों में उठा लिया और महल में चला गया। तब राजा ने पुत्र प्राप्ति के उपलक्ष्य में इतना धन गरीबों में लुटाया कि नगर में कोई दरिद्र ही न रहा। नृत्य-वाद्य आदि के साथ राजा ने विधिपूर्वक बालक को अपनाया और उसका नाम रखा—चंद्रप्रभ। राजमहल में हर प्रकार के सुखों के साथ धीरे-धीरे राजकुमार बड़ा होने लगा। जब वह युवक हुआ तो राज ने उसे राज्यभार सौंप दिया और वह तीर्थाटन के लिए वाराणसी चला गया।
नीति जानने वाला उसका पुत्र जब अपनी प्रजा पर धर्मपूर्वक शासन चला रहा था, तभी सूचना मिली कि वाराणसी में उसके पिता का देहान्त हो गया है। पिता की मृत्यु का संवाद पाकर राजा चंद्रप्रभ ने उसके लिए शोक किया तथा उसके लिए श्राद्ध आदि किए। फिर वह धर्मात्मा अपने मंत्रियों से बोला—'पिताजी से भला मैं किस प्रकार उऋण हो सकता हूं। फिर भी मैं अपने हाथों उनका एक ऋण चुकाऊंगा। मैं उनकी अस्थियां ले जाकर विधिपूर्वक गंगा में प्रवाहित करूंगा तथा गया जाकर सभी पित्तरों को पिंडदान दूंगा। मैं इसी प्रसंग में पूर्व समुद्र तक की तीर्थयात्रा भी करूंगा।”
राजा के ऐसा कहने पर उसके मंत्री उससे बोले—'देव ! आपको किसी प्रकार ऐसा नहीं करना चाहिए। आप यदि राज्य को इस प्रकार अरक्षित छोड़कर चले गए तो पीछे से शत्रुओं को राज्य पर आक्रमण करते देर न लगेगी। अतः आप पिता के संबंध में यह कार्य किसी और के हाथों करा लें। एक राजा के लिए प्रजापालन के अतिरिक्त और कोई बड़ा धर्म नहीं है।”
अपने मंत्रियों की बात सुनकर राजा चंद्रप्रभ ने कहा—"हम जो कुछ निश्चय कर चुके हैं, वह अटल है। पिता के लिए मुझे तीर्थयात्रा अवश्य करनी है। इस क्षणभंगुर शरीर का क्या विश्वास ? पता नहीं कब पूज्य पिताजी की तरह मेरा साथ छोड़ दे। अतः मेरा आदेश है कि जब तक मैं इस तीर्थयात्रा से वापस न लौट आऊं, मेरे स्थान पर तुम लोग मेरे राज्य की रक्षा करोगे।”
राजा की यह आज्ञा सुनकर मंत्रिगण चुप ही रहे। तब वह राजा अपनी यात्रा की तैयारियां करने लगा। एक शुभ दिन स्नानादि करके उसने अग्निहोत्र की विधि सम्पन्न की और ब्राह्मणों का पूजन किया। फिर शांत वेश धारण करके जुते हुए रथ में बैठकर उसने नगर से प्रस्थान किया।
जो सामंत, राजपुत्र, नगरवासी तथा ग्रामीण, राजा को छोड़ने सीमान्त तक आए थे, उनकी इच्छा न होने पर भी राजा चंद्रप्रभ ने बड़ी कठिनता से उन्हें समझा-बुझाकर वापस लौटा दिया और मंत्रियों को राज्य-शासन का भार सौंपकर, वाहनों पर आरूढ़ ब्राह्मणों तथा पुरोहितों के साथ वे आगे बढ़े।
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