बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट
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Read in contextबेताल की यह बात सुनकर राजा ने कुछ इस प्रकार उसका निराकरण किया—‘‘हे बेताल ! जो प्राणी दुर्बल होता है, वह भय के उपस्थित होने पर अपने प्राणों की रक्षा के लिए अपने माता-पिता को पुकारता है। उनके न होने पर राजा को पुकारता है क्योंकि आर्तजनों की रक्षा के लिए ही तो राजा बनाए जाते हैं। यदि उसे राजा का भी सहारा नहीं मिलता तो फिर वह अपने कुलदेवता का स्मरण करता है। उस बालक के तो सभी सहायक वहां उपस्थित थे लेकिन वे सब-के-सब प्रतिकूल हो गए थे। माता-पिता ने धन के लोभ में उस बालक के हाथ-पैर पकड़ रखे थे। राजा अपने प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं उसका वध करने को उद्यत था और वहां देवता के रूप में जो ब्रह्मराक्षस था, वही उसका भक्षक था। जो शरीर नाशवान है, जिसका अंत कड़वा है तथा जो अधिकाधिक जर्जर है, उसके लिए भी उन मूढ़मति वाले लोगों की ऐसी विडम्बना देखकर उसे आश्चर्य हुआ। जिन शरीरों में ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और शंकर का निवास होता है, वे भी अवश्य नष्ट हो जाते हैं और उसी शरीर को स्थिर बनाए रखने की इन सबमें कैसी विचित्र वासना है ! वह बालक उन लोगों की देह-ममता की यह विचित्रता देखकर अचरज में पड़ गया और अपनी अभिलाषा को पूर्ण जानकर प्रसन्न हुआ और इसी आश्चर्य व प्रसन्नता से वह हंस पड़ा था।’’
राजा विक्रमादित्य जब ऐसा कहकर चुप हो गए, तब वह बेताल अपनी माया के बल से विक्रमादित्य के कंधे से गायब होकर फिर अपनी जगह पर जा पहुंचा। राजा भी बिना आगा-पीछा देखे शीघ्रतापूर्वक पुनः उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।
बड़े लोगों का हृदय समुद्र के समान होता है, उसे किसी भी तरह से क्षुब्ध नहीं किया जा सकता।
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