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बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट

DevanagariHindipublished151 pages

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निकले थे। इसी समय फंदा टूट गया और मैं भूमि पर गिर पड़ा। जब मुझे चेतना आई तो मैंने देखा कि कोई कृपालु पुरुष वस्त्र से शीघ्रतापूर्वक हवा करके मुझे सचेत करने का प्रयत्न कर रहा है।

“एक क्षण रुककर वह फिर बोला—‘उस व्यक्ति ने मुझसे कहा—‘अरे भाई, विद्वान होकर भी तुम किसके लिए इतना खेद कर रहे हो? मनुष्य को उसके सुकर्मों से सुख और दुष्कर्मों से दुख मिलता है। अतः यदि तुम दुखों से घबरा गए हो तो सत्कर्म करो। तुम आत्महत्या करके नरक के दुख की कामना क्यों करते हो?’ यह कहकर मुझे समझाकर वह व्यक्ति वहां से चला गया। मैं भी इस कारण मरने का इरादा छोड़कर यहां चला आया। स्पष्ट है कि विधाता की इच्छा न होने पर मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता। अतः अब मैं किसी तीर्थस्थान पर जाकर तपस्या करूंगा और इस प्रकार शरीर का त्याग करूंगा कि फिर मुझे निर्धनता का दुख न भोगना पड़े।”

बड़े भाई के ऐसा कहने पर उसके छोटे भाई उससे यह बोले—‘‘आर्य, आप विद्वान होकर भी धन हीनता के कारण दुखी क्यों हो रहे हो? क्या आप नहीं जानते कि धन तो शरद के मेघों की तरह चंचल होता है। दुर्जन की मित्रता, वेश्या और लक्ष्मी—ये तीनों ही अंत में आंखें फेर लेती हैं। इनकी चाहे जितनी रखवाली की जाए, चाहे जितनी सावधानी रखी जाए, ये कभी किसी के होकर नहीं रहते। अतः मनस्वी पुरुष को यल करके कोई ऐसा गुण अर्जित करना चाहिए जो धन रूपी हिरण को बलपूर्वक बार-बार बांधकर ला सके।”

छोटे भाइयों की यह बातें सुनकर बड़े भाई ने शीघ्र ही धैर्य धारण करते हुए कहा—‘‘तो फिर अर्जन करने योग्य कौन-सा गुण हो सकता है?” बाद में, वे सभी सोच-विचार करके एक-दूसरे से कहने लगे—‘‘सारी दुनिया को छानकर हम लोग कोई विशेष ज्ञान अर्जित करेंगे।” ऐसा निश्चय करके और लौटकर मिलने का एक ठिकाना बताकर वे चारों, चार अलग-अलग दिशाओं में चले गए।

समय पाकर वे चारों निश्चित किये हुए ठिकाने पर आ मिले और एक दूसरे से यह बताने लगे कि किसने क्या सीखा है।

उनमें से एक ने कहा—‘‘मैंने तो ऐसी विद्या सीखी है कि मुझे जिस किसी प्राणी की हड्डी का एक टुकड़ा मिल जाए, तो मैं अपनी विद्या से क्षण-भर में उसमें उस प्राणी के योग्य मांस तैयार कर दूं।”

इस पर दूसरे ने कहा—‘‘मैं उसके अनुकूल चमड़ी और रोम तैयार कर सकता हूं।”

इस पर तीसरे ने कहा—‘‘चमड़ी, मांस और रोएं हो जाने पर मै उस प्राणी के अवयव और आकृति बना सकता हूं।”

अब चौथे की बारी थी, उसने कहा—‘‘अवयव और आकृति बन जाने पर मै उस प्राणी में प्राण का संचार कर देना जानता हूं।”

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