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बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट

DevanagariHindipublished151 pages

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यहाँ चित्र में दिए गए पाठ का देवनागरी लिप्यंतरण है:

हर्षवती नाम की एक नगरी में एक धनवान बनिया रहता था। वासुदत्ता नाम की उसकी एक कन्या थी, जो अत्यंत सुंदर थी। बनिया उसे अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करता था। उसने अपनी उस कन्या का विवाह समुद्रदत्त नाम के एक सजातीय युवक के साथ कर दिया जो सज्जनों के निवास-स्थान ताम्रलिपि में रहता था। समुद्रदत्त सज्जन था। वह वासुदत्ता के समान ही रूप-यौवन वाला था। सुंदर स्त्रियां उसकी ओर इस तरह टकटकी लगाए देखती थीं जैसे चंद्रमा को चकोर देखता है।

एक बार जब वासुदत्ता का पति अपने देश में था और वह अपने पिता के घर थी, तो उसने दूर से एक पुरुष को देखा। उस सुंदर युवक को देखकर वह चंचल स्त्री कामातुर हो गई और अपनी सखी द्वारा उसे गुप्त रूप से बुलवाकर उसके साथ काम-क्रीड़ाएं कीं। उसके बाद भी वह उससे गुप्त रूप से अनेकों बार मिली। उसकी उस सखी के अलावा किसी और को उसकी करतूतों का पता न चला।

एक दिन उसका पति अपने देश से वापस लौटा तो उसके सास-श्वसुर ने उसका बहुत आदर-सत्कार किया और उसे उचित मान-सम्मान दिया। अपनी इकलौती संतान वासुदत्ता का पति होने के कारण उनके लिए वह सबसे प्रिय व्यक्ति था।

वह सारा दिन उत्सव-उल्लास में बीता। रात में वासुदत्ता की माता ने अपनी बेटी को सजा-संवारकर उसके पति के शयनकक्ष में भेजा। किंतु एक ही सेज पर सोकर भी वह अपने पति के प्रति अनुरक्त न हुई। दूसरे पुरुष में मन लगा रहने के कारण, पति के आग्रह करने पर भी वह नींद आने का बहाना किए पड़ी रही। तब राह की थकावट और मदिरा के नशे से चूर उसके पति को जल्द ही नींद आ गई। धीरे-धीरे घर के सब लोग सो गए किंतु करवट लिए वासुदत्ता जागती हुई अपने प्रेमी के विचारों में खोई रही। तभी एक चोर उसके महल में दाखिल हुआ और वासुदत्ता को जागता हुआ महसूस कर एक अंधेरे कोने में सिमटकर खड़ा हो गया। वासुदत्ता अपने प्रेमी से मिलने को बेचैन हो रही थी। उसने अपने प्रेमी से दिन में ही यह मालूम कर लिया था कि रात के समय उन्हें कहां मिलना है। अतः वह चुपचाप उठी और खूब गहने पहनकर, सज-संवरकर, अपने प्रेमी से मिलने महल से निकल पड़ी।

यह देखकर उस चोर को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने सोचा कि 'जिन गहनों की चोरी करने मैं यहां आया हूं, वह गहने तो यह स्त्री पहनकर बाहर जा रही है। अतः इसका पीछा करके यह तो देखूं कि यह कहां जा रही है? रास्ते में ही इसके गहने भी लूट लूंगा।' यही सोचकर वह चोर भी चुपचाप उस वणिकपुत्री पर नजर रखता हुआ, छिपकर उसके पीछे-पीछे चलने लगा।

कुछ दूर जाने पर चोर ने देखा कि वणिकपुत्री की एक सखी उसके लिए कुछ फूल और मालाएं लिए एक उद्यान में घुस गई जहां उसके प्रेमी ने उससे मिलने का वचन दे रखा था।

वासुदत्ता जब प्रेमी द्वारा बताए मिलन-स्थल पर पहुंची तो उसने अपने प्रेमी को एक

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