Skip to content
BharatKosha
बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट

DevanagariHindipublished151 pages

Page 28 of 151

Read in context
Page 28

अनन्तर, दैनिक कार्यों से निबटकर वह भोजन करता और फिर रात में राजा के सिंहद्वार पर जाकर, हाथ में तलवार लिए पहरा दिया करता था। राजा शूद्रक ने जब अपने गुप्तचरों से उसका प्रतिदिन का नियम सुना, तो वह मन-ही-मन बहुत संतुष्ट हुआ। राजा ने उसे पुरुषों में श्रेष्ठ और विशेष रूप से आदर के योग्य समझा तथा उसका पीछा करने वाले गुप्तचरों को रोक दिया।

इसी तरह दिन बीतते रहे। वीरवर ने कठोर धूपवाली गर्मी के दिन सहज ही बिता दिएं। घनघोर वर्षा के कष्टदायी दिन भी वह उसी तरह अपने कर्तव्य हेतु अटल रहकर सिंहद्वार पर बिताता रहा। शूद्रक ने कई बार रातों में स्वयं जाकर उसकी जांच की किंतु हर बार उसने वीरवर को अपनी नौकरी पर मुश्तैद पाया।

एक बार जब राजा प्रजा का हालचाल जानने के उद्देश्य से रात को महल से बाहर निकल रहा था तो उसने दूर कहीं से आती हुई किसी स्त्री के रोने की आवाज सुनी। उस आवाज में बहुत दर्द, करुणा और दुख-विह्वलता भरी हुई थी। राजा को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने सोचा कि 'मेरे राज्य में न तो कोई सताया हुआ है, न ही कोई दरिद्र है और न ही कोई दुखी। तो फिर यह स्त्री कौन है और इस भयंकर रात्रि में, जब सर्वत्र घनघोर वर्षा हो रही हो, क्यों इस प्रकार करुण-रुदन कर रही है ?'

राजा को उस पर बहुत दया आई। उसने वीरवर से कहा—"वीरवर, सुनो। दूर कोई स्त्री करुण स्वर में रुदन कर रही है। तुम जाकर पता लगाओ कि वह कौन है और क्यों रो रही है ?" राजा की बात सुनकर वीरवर ने 'जो आज्ञा' कहा और अपनी कमर में कटार खोंसकर हाथों में तलवार लिए तुरंत वहां से निकल पड़ा।

बाहर घनघोर वर्षा हो रही थी। रह-रहकर बिजली कौंध रही थी और बादल ऐसे गरज रहे थे जैसे फट पड़ने के लिए वे बेचैन हो रहे हों। वीरवर को इतनी कर्त्तव्यनिष्ठा के साथ ऐसे बुरे मौसम में भी राजाज्ञा का पालन करने के लिए जाते देख राजा को उस पर बहुत दया आई। उसे कौतूहल भी हुआ, इसलिए वह भी उसके पीछे-पीछे हाथ में तलवार लिए लुकता-छिपता हुआ चल पड़ा।

उसका अनुसरण करता हुआ वीरवर नगर के बाहर जा पहुंचा। वहां उसने एक सरोवर के किनारे एक स्त्री को विलाप करते देखा जो बार-बार—"हा वीर—हा कृपालु—हा स्वामी—हा त्यागी, तुम्हारे बिना कैसे रहूंगी ?" कहती वह हुई रो रही थी।

वीरवर ने आश्चर्यचकित होकर पूछा—"हे सुभगे, तुम कौन हो और रात के इस प्रहर में इस प्रकार क्यों रो रही हो ?"

तब वह स्त्री बोली—"हे वीरवर, मैं पृथ्वी हूं। इस समय मेरे स्वामी राजा शूद्रक हैं, जो धर्मात्मा हैं। आज से तीसरे दिन उनकी मृत्यु हो जाएगी। फिर, मैं उनके समान किस दूसरे राजा को अपने स्वामी के रूप में पाऊंगी ? यही गम मुझे खाए जा रहा है। इसी शोक से दुखी होकर मैं उनके तथा अपने लिए विलाप कर रही हूं।"

बेताल पच्चीसी ❏ 29