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बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट

DevanagariHindipublished151 pages

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ब्याहने का वचन दिया एवं सातवें दिन विवाह की तिथि निश्चित कर दी। उसी समय उज्जयिनी में एक दूसरे ब्राह्मण ने हरिस्वामी के पुत्र देवस्वामी के पास आकर उसकी बहन से विवाह करने की याचना की। देवस्वामी ने जब उसे अपनी बहन की शर्तें बताईं तो वह ब्राह्मण अपनी विद्या का कौशल दिखाने को तत्पर हो गया और उसने अपने अस्त्र-शस्त्रों के कौशल का प्रदर्शन किया। यह देख देवस्वामी ने उसी के साथ अपनी बहन का विवाह करने का निश्चय कर लिया। अपनी माता की अनुपस्थिति में उसने भी ज्योतिषियों के कथनानुसार सातवें दिन ही विवाह का निश्चय कर लिया।

उसी समय एक तीसरे व्यक्ति ने भी सोमप्रभा की माता के सम्मुख स्वयं को ज्ञानी बताते हुए उसकी बेटी से विवाह करने की याचना की। उसने ज्ञानी होने का प्रमाण भी दिया जिससे प्रभावित होकर सोमप्रभा की माता ने उससे सातवें दिन अपनी कन्या का विवाह करने का वचन दिया।

अगले दिन हरिस्वामी घर लौट आया। आकर उसने अपनी पत्नी और पुत्र को बताया कि वह कन्या का विवाह निश्चित कर आया है। इस पर उन दोनों ने भी अलग-अलग बतलाया कि उन्होंने क्या निश्चय किया है। उनकी बातें सुनकर हरिस्वामी चिंता में पड़ गया कि एक-साथ तीन व्यक्तियों के साथ उसकी कन्या का विवाह कैसे होगा?

अनन्तर, विवाह की निश्चित तिथि को ज्ञानी, वीर और अलौकिक विद्याएं जानने वाला, ये तीनों ही वर हरिस्वामी के घर पहुंचे। इसी समय एक विचित्र बात हो गई। ब्राह्मण की कन्या सोमप्रभा, जो वधु बनने वाली थी, अचानक कहीं गायब हो गई। ढूंढने पर भी उसका कोई पता न चला।

तब घबराए हुए हरिस्वामी ने ज्ञानी पुरुष से कहा—‘‘हे ज्ञानी, अब झटपट यह बताइए कि मेरी कन्या कहां है?’’

यह सुनकर ज्ञानी ने अपने ज्ञान द्वारा पता करके उसे बतलाया—‘‘हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, आपकी कन्या को धूम्रशिख नाम का एक राक्षस उठाकर विंध्याचल के वन में स्थित अपने घर में ले गया है।’’

ज्ञानी द्वारा ऐसा बताए जाने पर हरिस्वामी भयभीत हो गया। वह बोला—‘‘हाय-हाय, अब वह कैसे मिलेगी और उसका विवाह भी कैसे होगा?’’ यह सुनकर अलौकिक विद्याएं जानने वाला युवक बोला—‘‘आप धैर्य रखें। ज्ञानी के कथनानुसार वह कहां ले जाई गई है, मैं अभी आपको वहां ले चलता हूं।’’

यह कह क्षण-भर में ही उसने सभी अस्त्रों से सजा एक आकाशगामी यान बनाया और उस पर हरिस्वामी, ज्ञानी तथा वीर को चढ़ाकर उन्हें विंध्याचल के उस वन में ले गया, जहां ज्ञानी ने राक्षस का भवन बताया था। यह वृत्तांत जानकर राक्षस क्रोधित हो गया और वह गर्जना करता हुआ बाहर निकल आया।

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