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बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट

DevanagariHindipublished151 pages

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Page 39

छठा बेताल रजक-कन्या की कथा

राजा विक्रमादित्य ने पुनः उस शिशपा-वृक्ष से बेताल को उतारा और मौन भाव से उसे कंधे पर डालकर अपने गन्तव्य की ओर चल पड़ा।

मार्ग में फिर बेताल ने मौन भंग करके कहा—"राजन, तुम वीर हो, बुद्धिमान हो, इसीलिए मेरे प्रिय हो। अतएव मैं तुम्हें एक मनोरंजक कथा सुनाता हूं। इससे तुम्हारा ज्ञानवर्द्धन तो होगा ही, रास्ते के भय से भी तुम्हें मुक्ति मिलेगी।" बेताल ने कथा आरंभ की।

शोभावती नामक एक नगरी में एक राजा राज करता था। उसका नाम था—यशकेतु। राज्य की उस राजधानी में देवी गौरी का एक उत्तम मंदिर था। मंदिर से दक्षिण में गौरी तीर्थ नाम का एक सरोवर था। वहां प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल-चतुर्दशी को एक मेला लगता था। भिन्न-भिन्न दिशाओं से बड़े-बड़े लोग वहां स्नान करने आया करते थे। एक बार उक्त तिथि को ब्रह्मस्थल नाम के एक गांव का धवल नामक एक युवक धोबी वहां स्नान करने आया।

उस तीर्थ में स्नान करने हेतु आई हुई, शुद्धपट की पुत्री मदनसुन्दरी को उसने देखा, और उसके रूप-सौंदर्य पर मोहित हो गया।

घर लौटकर वह बेचैन रहने लगा। उसने खाना-पीना भी छोड़ दिया। उसकी मां ने उसके बेचैन रहने का कारण पूछा तो धवल ने अपने मन की बात अपनी मां को बताई। उसकी मां ने अपने पति को जाकर सारी बातें बताईं तो उसके पिता ने कहा—"बेटा, जिसके मिलने में कोई कठिनाई नहीं है, उसके लिए तुम इस प्रकार शोक क्यों कर रहे हो ? मेरे मांगने पर शुद्धपट तुमको अपनी कन्या दे देगा क्योंकि कुल में, धन में और कर्म में हम उसके समान ही हैं। मै उसे जानता हूं, वह भी मुझे जानता है—इसलिए यह कार्य मेरे लिए दुष्कर नहीं है।"

इस तरह बेटे को समझा-बुझाकर उसने उसे खाने-पीने के लिए राजी कर लिया। दूसरे दिन उसका पिता विमल उसे लेकर शुद्धपट के पास पहुंचा। वहां जाकर उसने अपने बेटे के लिए उसकी कन्या मांगी। उसके पिता ने आदरपूर्वक इसके लिए वचन दिया।

अगले दिन, विवाह का लग्न निश्चित करके उसने अपनी कन्या का विवाह धवल के साथ कर दिया। देखते ही जिस पर वह आसक्त हो गया था, ऐसी सुन्दरी से विवाह करके, सफल मनोरथ होकर धवल उस स्त्री सहित पिता के घर लौट आया। उन दोनों को सुखपूर्वक रहते हुए जब कुछ समय बीत गया, तब धवल का साला अर्थात् मदनसुन्दरी का भाई वहां आया।

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