बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट
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Read in contextके योग्य न जान पड़ा, तब उसने स्नेह से अपनी पुत्री से कहा—‘‘बेटी, मुझे तुम्हारे योग्य कोई वर नहीं मिलता, अतः तुम स्वयंवर द्वारा अपना वर स्वयं ही चुनो।’’
पिता की यह बात सुनकर उस राजकुमारी ने कहा—‘‘पिताजी, लज्जा के कारण मैं स्वयंवर नहीं करना चाहती, किंतु जो भी सुरूप युवक कोई अनूठी कला जानता हो, आप उसी से मेरे विवाह कर सकते हैं। इससे अधिक मैं और कुछ नहीं चाहती।’’
अपनी कन्या अनंगरति की बात सुनकर राजा उसके लिए वैसे ही वर की खोज करने लगा।
इसी बीच, लोगों के मुंह से यह वृत्तांत सुनकर दक्षिण-पथ से चार पुरुष वहां आ पहुंचे, जो वीर थे, कलाओं में निपुण थे और भव्य आकृति वाले थे।
राजा ने उनका स्वागत-सत्कार किया। तब उस राजपुत्री की इच्छा रखने वाले वे चारों पुरुष, एक के बाद एक राजा ने अपने-अपने कौशल का वर्णन करने लगे।
उनमें से एक ने कहा—‘‘मैं शूद्र हूं, मेरा नाम पंचपट्टिक है। मैं प्रतिदिन पांच जोड़े उत्तम वस्त्र तैयार करता हूं। उनमें से एक जोड़ा वस्त्र मैं देवता को चढ़ाता हूं और एक जोड़ा ब्राह्मण को देता हूं। एक जोड़ा मैं पहनने के लिए रखता हूं। इस राजकन्या का विवाह यदि मुझसे होगा तो एक जोड़ा मैं इसे दूंगा और एक जोड़ा वस्त्र बेचकर मैं अपने खाने-पीने का निर्वाह करूंगा। अतः इस अनंगरति का विवाह आप मुझसे करें।’’
पहले पुरुष के बाद दूसरा बोला—‘‘राजन ! मैं भाषाज्ञ नामक वैश्य हूं। मैं सब पशु-पक्षियों की बोलियां जानता और समझता हूं। अतः इस राजपुत्री को आप मुझे दे दें।’’
अनंतर, जब दूसरा ऐसा कह चुका तो तीसरा बोला—‘‘राजन, मैं एक पराक्रमी क्षत्रिय हूं। मेरा नाम खड्गधर है। खड्ग विद्या में मेरी बराबरी करने वाला इस धरती पर कोई नहीं है। अतः राजन, आप अपनी कन्या का विवाह मुझसे ही करें।’’
यह सुनकर चौथा बोला—‘‘मैं एक ब्राह्मण हूं, राजन। मेरा नाम जीवदत्त है। मेरे पास ऐसी विद्या है, जिससे मैं मरे हुए प्राणियों में जान डाल देता हूं। अतः ऐसे कार्य में दक्ष मुझको आप अपनी कन्या के लिए पति रूप में स्वीकार करें।’’
दिव्य वेश वाले उन चारों पुरुषों के ऐसा कहने पर राजा सोच में पड़ गया और विचार करने लगा कि वह किसके साथ अपनी कन्या का विवाह करे।
इतनी कथा सुनाकर बेताल ने विक्रमादित्य से पूछा—‘‘राजन, अब तुम्हीं बताओ कि राजकुमारी अनंगरति का विवाह उन चारों में से किसके साथ होना चाहिए ? जानकर भी यदि तुम इसका सही उत्तर नहीं दोगे तो मेरे श्राप द्वारा तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे।’’
यह सुनकर बेताल को राजा विक्रमादित्य ने बताया—‘‘योगेश्वर, आप समय बिताने के लिए ही, मुझे मौन भंग करने को विवश करते हैं, अन्यथा आपका यह प्रश्न
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