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बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट

DevanagariHindipublished151 pages

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तब मदनसेना बोली—‘‘मैं कुमारी हूं, दूसरे की वाग्दत्ता पली भी हूं। अब मैं आपकी नहीं हो सकती क्योंकि मेरे पिता समुद्रदत्त नामक व्यापारी से मेरा रिश्ता तय कर चुके हैं। थोड़े ही दिनों में मेरा विवाह होने वाला है इसलिए आप चुपचाप चले जाएं, क्योंकि कोई देख लेगा तो मुझे दोष लगेगा।’’

इस प्रकार, बहुत तरह से उसके समझाने पर धर्मदत्त ने कहा—‘‘मेरा चाहे जो भी हो, मैं तुम्हारे बिना जीवित नहीं रह सकता।’’

उसकी यह बात सुनकर मदनसेना इस भय से विकल हो गई कि कहीं यह बल-प्रयोग न करे। उसने कहा—‘‘आपने अपने प्रेम से मुझे जीत लिया है किंतु पहले मेरा विवाह हो जाने दीजिए। पहले पिताजी को कन्यादान का चिर-आकांक्षित फल प्राप्त हो जाए, फिर मैं आपके पास चली आऊंगी।’’

यह सुनकर धर्मदत्त ने कहा—‘‘मैं यह नहीं चाहता कि मेरी प्रिया, मुझसे पहले किसी और की हो चुकी हो, क्योंकि दूसरा जिसका रस ले चुका हो, क्या उस कमल पर भौंरा प्रीति रख सकता है?’’

उसके यह कहने पर मदनसेना बोली—‘‘तब विवाह होते ही, पहले मैं आपके पास आऊंगी और तब अपने पति के पास जाऊंगी।’’

मदनसेना के ऐसा कहने पर भी उस वणिक-पुत्र ने बिना पूरे विश्वास के उसे नहीं छोड़ा। उसने शपथ के साथ उसे सत्यवचन में बांध लिया, तब उससे छुटकारा पाकर, घबराई हुई मदनसेना अपने घर गई।

विवाह का समय आने पर जब उसके विवाह का मंगल-कार्य समाप्त हुआ, तब वह पति के घर आई। हंसी-खुशी में दिन बिताकर, रात के समय, वह पति के साथ शयनकक्ष में गई।

वहां पलंग पर बैठकर भी उसने अपने पति समुद्रदत्त की आलिंगन आदि चेष्टाओं को स्वीकार नहीं किया। समुद्रदत्त ने जब अपनी मीठी-मीठी बातों से उसे रिझाने की कोशिश की तो मदनसेना की आंखों में आंसू भर आए। तब समुद्रदत्त ने यही सोचकर कि ‘‘शायद इसे मैं पसंद नहीं हूं, मदनसेना से कहा—‘सुन्दरी, यदि तुम्हें मैं पसंद नहीं हूं तो मुझे भी तुमसे कोई काम नहीं है, तुम्हें जो भी प्रिय हो, तुम उसी के पास चली जाओ’।’’

यह सुनकर मदनसेना ने सिर झुका लिया। फिर धीरे-धीरे वह बोली—‘‘आर्यपुत्र ! आप मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं किंतु मुझे आपसे कुछ कहना है। आप उसे सुनें और मुझे अभयदान दें ताकि मैं सच्ची बात आपसे कह सकूं।’’

बड़ी कठिनाई से उसके ऐसा कहने पर समुद्रदत्त ने उसका आग्रह स्वीकार कर दिया। तब वह लज्जा व विषाद से भरी भयभीत-सी बोली—‘‘एक बार जब मैं अपने

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