बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट
Page 67 of 151
Read in contextपत्नी के ऐसा कहने पर मंत्री बोला—‘‘तुमने ठीक कहा, प्रिये। मैं बिल्कुल ऐसा ही करूंगा।’’
तब वह राजा के पास गया और बातों-ही-बातों में उसने राजा से कहा—‘‘राजन, आप मुझे कुछ दिनों के लिए छुट्टी दे दें, जिससे मैं तीर्थयात्रा पर जा सकूं क्योंकि धर्म में मेरी बहुत आस्था है।’’
यह सुनकर राजा ने कहा—‘‘ऐसा मत करो मंत्रिवर। तीर्थयात्रा के बिना भी, घर में रहते हुए दान आदि करके तुम पुण्यफल प्राप्त कर सकते हो।’’
मंत्री बोला—‘‘दान आदि के द्वारा तो अर्थ शुद्धि ही पाई जा सकती है, राजन। किंतु तीर्थों से अनश्वर शुद्धि प्राप्त होती है. अतः बुद्धिमान लोगों को चाहिए के वे यौवन के रहते हुए ही तीर्थयात्रा कर लें। शरीर का कोई भरोस नहीं है। समय बीत जाने पर फिर तीर्थयात्रा कैसे हो सकती है?’’
मंत्री जब इस प्रकार राजा को समझाने का प्रयास कर रहा था, तभी प्रतिहारी वहां पहुंचा और राजा से बोला—‘‘स्वामी, दोपहर का समय हो चुका है, अतः आप उठकर स्नान कर लें क्योंकि स्नान का समय बीता जा रहा है।’’
यह सुनते ही राजा स्नान के लिए उठकर खड़ा हो गया। यात्रा के लिए तैयार मंत्री भी उसे प्रणाम करके वहां से चला आया।
मंत्री ने घर आकर जैसे-तैसे अपनी पत्नी को मनाया क्योंकि वह स्वयं भी उसके साथ चलने का आग्रह कर रही थी। फिर वह अकेला ही यात्रा के लिए चल पड़ा। अनेक देशों में घूमता हुआ और तीर्थों की यात्रा करता हुआ वह मंत्री पौंड्र देश में जा पहुंचा।
उस देश के एक नगर में समुद्र किनारे एक शिव मंदिर था। दीर्घदर्शी उस मंदिर में पहुंचा और वहां मंदिर के आंगन में बैठकर श्रम की थकान दूर करने लगा। वहां देवताओं के पूजन के लिए आए हुए निधिदत्त नामक एक वणिक ने दीर्घदर्शी को देखा, जो दूर से आने के कारण धूल से भरा हुआ था और कड़ी धूप के कारण कुम्हला गया था।
मंत्री को ऐसी अवस्था में यज्ञोपवीत पहने एवं उत्तम लक्षणों वाला देखकर वणिक ने उसे कोई श्रेष्ठ ब्राह्मण समझा और सत्कारपूर्वक उसे अपने घर ले आया। घर ले जाकर उस वणिक ने मंत्री को स्नान कराया। उत्तम भोजन आदि से सत्कार करने के बाद जब वह विश्राम कर चुका तो उससे पूछा—‘‘श्रीमंत, आप कौन हैं? कहां के रहने वाले हैं और कहां जा रहे हैं?’’
तब दीर्घदर्शी ने उससे गंभीरतापूर्वक कहा—‘‘मैं एक ब्राह्मण हूं और तीर्थ यात्रा करता हुआ यहां आया हूं।’’ तब व्यापारी निधिदत्त ने दीर्घदर्शी से कहा—‘‘हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मैं व्यापार करने के लिए सुवर्णद्वीप जाने वाला हूं। इसलिए तुम मेरे घर में तब तक ठहरो, जब तक कि मैं लौटकर नहीं आ जाता। तुम तीर्थ यात्रा से थके हुए हो, यहां रहकर विश्राम भी कर लोगे।’’
68 ☐ बेताल पच्चीसी