बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट
Page 82 of 151
Read in contextउसने एक अकेले व्यक्ति को एक मकान की चारदीवारी कूदते हुए देखा। वह व्यक्ति बहुत सतर्कता पूर्वक चल रहा था। उसकी आखें शंकित और चंचल थीं तथा वह बार-बार मुड़कर पीछे देखने लगता था।
राजा को संदेह हुआ कि अवश्य ही यही वह चोर है, जो नगर मे चोरियां किया करता है। ऐसा सोचकर वह चोर के निकट पहुंचा। चोर ने उसे अपने समीप आया देखकर उसे भी कोई चोर समझा और जब उसने राजा से उसका परिचय पूछा तो यह कहकर राजा ने उस चोर को संतुष्ट किया कि वह भी एक चोर है।
तब उस चोर ने कहा—‘‘तब तो तुम मेरे ही हमपेशा हुए और कहावत भी है कि चोर-चोर मौसेरे भाई। अतः मित्र तुम मेरे साथ मेरे घर चलो, मैं वहां तुम्हारा उचित स्वागत-सत्कार करूंगा।’’ राजा उसकी बात मानकर उसके घर गया, जो एक वन में खोदी हुई भूमि के नीचे तहखाने के रूप में था।
उस विशाल घर में सुख-सुविधाओं के समस्त साधन मौजूद थे। वहां तेज रोशनी वाले दीपो की रोशनी हो रही थी। राजा जब एक आसन पर बैठ गया, तब चोर घर के एक भीतरी हिस्से में चला गया। कुछ ही समय पश्चात् एक दासी वहां पहुंची और फुसफुसाते स्वर में राजा से बोली—‘‘हे महाभाग, आप यहां मृत्यु के मुख में क्यों चले आए ? यह पापी तो एक कुख्यात चोर है। जब यह बाहर निकलेगा तो निश्चय ही आपके साथ विश्वासघात करेगा। आपके लिए यही अच्छा रहेगा कि आप तुरत यहां से निकल जाएं। ’’
चोर का ठाठ-बाट देखकर बहुत कुछ अनुमान लगा चुका था। अतः उसने दासी के कथनानुसार उस समय वहां से पलायन करना ही उचित समझा और वह चुपचाप वहां से निकलकर अपने महल लौट आया। महल में पहुंचकर उसने तुरंत अपनी सेना की एक बड़ी-सी टुकड़ी को तैयार किया और सैनिकों को ले जाकर उस चोर के आवास को चारों ओर से घेर लिया। चोर ने जब इस प्रकार अपने को घिरा हुआ देखा तो वह समझ गया कि उसका भेद खुल गया है, इसलिए वह मरने का निश्चय करके युद्ध के लिए बाहर निकल आया।
उस चोर ने राजा की सेना के साथ अकेले ही जमकर खूब लोहा लिया। पर अंत में राजा ने उसे निःशस्त्र करके पकड़ ही लिया। राजा उस चोर को बांधकर उसके घर की सारी वस्तुएं और धन लेकर महल लौट आया। सवेरा होने पर उसने उस चोर को सूली पर चढाकर प्राणदण्ड का आदेश दे दिया।
डौंडी पीटकर जब उस चोर को वध-भूमि में ले जाया जा रहा था, तब अपने महल की छत पर से उस वणिक-कन्या रत्नावती ने उसे देखा। वह चोर घायल था, उसके अंग धूल से भरे थे, फिर भी रत्नावती उसे देखकर कामवश हो गई। उसने जाकर अपने पिता से कहा—‘‘पिताजी, जिस पुरुष को ये लोग वध करने ले जा रहा है, मैने मन-ही-मन उसे अपना पति स्वीकार कर लिया है। अतः आप राजा से
83 बेताल पच्चीसी ⯀ 83