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बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट

DevanagariHindipublished151 pages

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दिन-प्रतिदिन दुबली होती जा रही हो। शशिप्रभा, तुम ऐसी दुखी प्रतीत हो रही हो जैसे अपने प्रियतम से तुम्हारा विछोह हो गया हो। मुझे सारी बात सच-सच बताओ क्योकि सखियों से दुराव उचित नही होता। यदि तुम मुझे सारी बाते सच नही बताओगी तो मै अन्न-जल त्यागकर आमरण अनशन शुरू कर दूंगी। "

यह सुनकर राजकुमारी ने गहरी सास ली और धीरे से कहा—"सखी, भला तुम पर अविश्वास कैसा ? तुम अगर जानना चाहती हो तो सुनो—एक बार मै बसंतोद्यान मे होने वाली यात्रा देखने गई थी। वहां मैने एक सुन्दर ब्राह्मण कुमार को देखा। उसकी सुंदरता हिमयुक्त चंद्रमा के समान थी। उसे देखते ही मेरी कामना उद्दीप्त होने लगी। मै उसके चेहरे की ओर एकटक देखने लगी। तभी कालमेघ के समान चिघाड़ता हुआ एक हाथी वहां आया। उसने अपना बंधन तोड़ दिया था। उस हाथी के माथे से मद-जल झर रहा था। उस विशालकाय हाथी को देखकर मेरे अंगरक्षक भाग खड़े हुए। मै भी बेहद भयभीत हो उठी। तभी तीर के समान वह ब्राह्मण कुमार मेरी ओर लपका और मुझे अपनी बाहों में उठाकर हाथी की पहुंच से दूर ले गया। चंदन लगे अमृत से सिक्त जैसे उसके शरीर के स्पर्श से मेरी दशा न जाने कैसी हो गई। मै उसके शरीर के स्पर्श का आनंद लेती रही। स्वयं को उसकी गोद से उतारने का मैने तनिक भी प्रयास नहीं किया। तभी मेरे रक्षक आ पहुंचे और मै लाचार होकर उनके साथ वापस महल चली आई। तभी से अपनी रक्षा करने वाले उस युवक को मै सपनों में देखती रहती हूं। मैं सोते समय स्वप्न में देखती हूं कि वह मेरी खुशामद कर रहा है और सहसा चुम्बन-आलिंगन के द्वारा मेरी लज्जा दूर करने का प्रयत्न करता है किंतु मैं अभागिनी उसका नाम आदि न जानने के कारण उसे पा नहीं सकती। इस तरह प्रियतम के विरह की आग मेरा हृदय जलाती रहती है।"

राजकन्या की इन बातो से कन्या का रूप धारण किए हुए उस ब्राह्मण युवक मनःस्वामी को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसे लगा जैसे किसी ने अमृतरस पिला दिया हो। उसने कृतार्थ होकर और अपने को प्रकट करने का अवसर जानकर अपने मुंह से गोली निकाली और अपना असली रूप धारण कर लिया। उसने कहा—"हे चंचल आंखों वाली, मैं ही वह व्यक्ति हूं जिसे उस उद्यान में दर्शन देकर तुमने खरीद लिया था। हे सुन्दरी ! पल-भर के परिचय के बाद ही तुमसे अलग होने पर मुझे जो कष्ट हुआ, उसी का यह परिणाम है कि मुझे स्त्री का रूप धारण करना पड़ा है। अतः मेरी और अपनी इस असहाय विरह व्यथा को दूर करो क्योकि मै इससे अधिक विरह व्यथा सहन नही कर सकता।"

अपने प्रियतम को सामने पाकर शशिप्रभा भाव-विह्वल हो उठी और प्रसन्नता से मनःस्वामी से ऐसे चिपक गई जैसे कोई लता, वृक्ष से चिपकती है। उन्होंने उसी समय गांधर्व विधि से विवाह कर लिया। फिर दोनों प्रेमी अपनी इच्छा के अनुसार सुख-भोग करने लगे।

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