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बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट

DevanagariHindipublished151 pages

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इस तरह वे दोनों माया के बल से पाई हुई उस राजकुमारी के लिए झगड़ने लगे। लेकिन उनके झगड़े का निबटारा नहीं हो सका।

इतनी कथा सुनाकर बेताल ने विक्रम से पूछा—‘‘हे राजन, अब तुम्हीं मेरा सशय दूर करो कि वह राजकुमारी वस्तुतः किसी स्त्री हुई ? यदि तुम जानते हुए भी मेरा संशय दूर नहीं करोगे तो तुम्हें पहले वाला ही शाप लगेगा। ’’

अपने कधे पर स्थित बेताल की यह बात सुनकर विक्रमादित्य ने उससे कहा—‘‘बेताल, मैं समझता हूं कि न्यायतः वह राजकुमारी, शशि की ही स्त्री मानी जाएगी, जिसे उसके पिता ने सबसे सामने शशि के साथ ब्याहा था। मनःस्वामी ने तो चोरी से गंधर्व विवाह के द्वारा उसे पाया था। पराए धन पर चोर का न्यायसंगत अधिकार कभी नहीं होता। ’’

राजा की ये न्यायसंगत बातें सुनकर बेताल संतुष्ट हुआ और पहले की ही भांति उसके कंधे से अचानक उतरकर पुनः अपनी जगह चला गया।

राजा भी उसे लाने के लिए पुनः वापस लौट पड़ा।

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