BharatKosha
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

by महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास)

DevanagariHindipublished638 pages

Page 35 of 638

Read in context
Page 35

४० ५. गुरु—'कर्क' राशि के ५ अंश पर । ६. शुक्र—'मीन' राशि के २७ अंश पर । ७. शनि—'तुला' राशि के २० अंश पर । टिप्पणी—कुछ विद्वान् मिथुन राशि के १५ अंश पर तथा कुछ वृष राशि में 'राहु' को उच्च मानते हैं। इसी प्रकार, कुछ के मत में धनु राशि के १५ अंश पर तथा कुछ वृश्चिक राशि में 'केतु' को उच्च का मानते हैं। ग्रहों की नीच स्थिति जिस ग्रह को जिस राशि के जितने अंशों पर उच्च का माना जाता है, उससे सातवीं राशि पर उतने ही अंशों में वह नीच का माना जाता है। यथा— १. सूर्य—'तुला' राशि के १० अंश पर । २. चन्द्र—'वृश्चिक' राशि के ३ अंश पर । ३. मंगल—'कर्क' राशि के २८ अंश पर । ४. बुध—'मीन' राशि के १५ अंश पर । ५. गुरु—'मकर' राशि के ५ अंश पर । ६. शुक्र—'कन्या' राशि के २७ अंश पर । ७. शनि—'मेष' राशि के २० अंश पर । टिप्पणी—कुछ विद्वानों के मतानुसार 'राहु' धनु राशि के १५ अंश पर तथा कुछ के मतानुसार वृश्चिक राशि में नीच का माना जाता है। इसी प्रकार, कुछ के मत में मिथुन राशि के १५ अंश तक तथा कुछ वृष राशि में 'केतु' को नीच का मानते हैं। ग्रहों का बलाबल ग्रहों के बल चार प्रकार के कहे गये हैं— १. सर्वोच्चबली—उच्च का होने पर । २. उच्च बली—मूल त्रिकोण में होने पर । ३. बली—स्वक्षेत्री (अपने घर) का होने पर । ४. निर्बल—नीच का होने पर । टिप्पणी—जो ग्रह जिस राशि का स्वामी होता है, यदि वह उसी राशि में बैठा हो तो उसे 'स्वग्रही' अथवा 'स्वक्षेत्री' कहा जाता है। विभिन्न ग्रहों के उच्च क्षेत्रीय, मूल त्रिकोणस्थ, स्वक्षेत्री तथा नीच का होने के सम्बन्ध में और अधिक स्पष्टता को नीचे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए—