भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ मूल त्रिकोणस्थ 'गुरु' बुध त्रिकोणस्थ 'शुक्र' [कुण्डली २१ : ९ (धनु) में गुरु] [कुण्डली २२ : ७ (तुला) में शुक्र] सुख त्रिकोणस्थ 'शनि' मूल त्रिकोणस्थ 'राहु' [कुण्डली २३ : ११ (कुम्भ) में शनि] [कुण्डली २४ : ४ (कर्क) में राहु] मूल त्रिकोणस्थ 'केतु' मूल त्रिकोणस्थ 'सभी ग्रह' [कुण्डली २५ : १० (मकर) में केतु] [कुण्डली २६ : १-मं., २-चं., ४-रा., ५-सू., ६-बु., ७-शु., ९-गु., १०-के., ११-श.] ग्रहों की उच्च स्थिति कौनसा ग्रह किस राशि के कितने अंश बीत जाने पर उच्च का माना जाता है, इसे निम्नानुसार समझना चाहिए— १. सूर्य—'मेष' राशि के १० अंश पर। २. चन्द्र—'वृष' राशि के ३ अंश पर। ३. मंगल—'मकर' राशि के २८ अंश पर। ४. बुध—'कन्या' राशि के १५ अंश पर।