भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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३८ मूल त्रिकोण की राशि एवं ग्रह-बोधक चक्र

ग्रहसूर्यचन्द्रमंगलबुधबुधशुक्रशनिराहुकेतु
राशिसिंह<br><br>से<br>२०<br>अंश<br>तकवृष<br><br>से<br>३०<br>अंश<br>तकमेष<br><br>से<br>१८<br>अंश<br>तककन्या<br><br>से<br>१५<br>अंश<br>तकधनु<br><br>से<br>१३<br>अंश<br>तकतुला<br><br>से<br>१०<br>अंश<br>तककुम्भ<br><br>से<br>२०<br>अंश<br>तककर्कमकर
नीचे की पहली ६ उदाहरण कुण्डलियों में विभिन्न ग्रहों को उनके मूल त्रिकोण
में स्थित अलग-अलग दिखाया गया है। अन्तिम उदाहरण कुण्डली में सभी ग्रहों को
एक साथ अपनी-अपनी मूल त्रिकोण राशियों में स्थित दिखाया गया है। ये सभी
कुण्डलियां मेष लग्न की हैं। इन्हीं के आधार पर अन्य लग्न वाली कुण्डलियों के
विषय में भी समझ लेना उचित है—
मूल त्रिकोणस्थ 'सूर्य'
(मेष लग्न की कुण्डली: पञ्चम भाव (सिंह राशि) में 'सूर्य')
मूल त्रिकोणस्थ 'चन्द्र'
(मेष लग्न की कुण्डली: द्वितीय भाव (वृष राशि) में 'चन्द्र')
मूल त्रिकोणस्थ 'मंगल'
(मेष लग्न की कुण्डली: प्रथम भाव (मेष राशि) में 'मंगल')
मूल त्रिकोणस्थ 'बुध'
(मेष लग्न की कुण्डली: षष्ठ भाव (कन्या राशि) में 'बुध')