बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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- १०० - धमधमी धाल्ली मचरहं¹ मोहि। धान गरंता² गणी मानही पांहि॥ सीजवंता सरणी मारिणी। बोलह एह³ पद वड⁴ जिसह⁵ मोठ⁶॥ मारह पद सह कोमुण्ड। सुन्द हम तिरिन न रवि तलह दीट॥१२९॥ दैमली कूवीछी⁷ महण की गूद्र। सामण उमीछह⁸ मत्त गयंद॥ चउपास की घडधंधी। सठहू पवन⁹ न राजहू न रापइ मूरि॥ —————————————— यह छंद अ० २ खंड ३ में २१, आ० ६ खंड ३ में २२, आ० ६ में नहीं है। आ० १२ में १२६ है। लेकिन इसकी ६वीं पंक्ति अ० २ और आ० ६ में इस प्रकार है:— "कहुं खीम जिण बोलियउ।" कयूं (आ० ६)। आ० १२ में ३री पंक्ति नहीं है। १. आ० १२ मचरफै। २. आ० १२ कहिता। ३. आ० १२ बोलैलै। ४. आ० १२ जेहवड। ५. आ० १२ वचन। ६. आ० १२ मुमोठ। यह छंद अ० १, आ० ६ और आ० ६ में नहीं है। आ० १२ में १२७ है। लेकिन पंक्ति २, ५ और ६ नहीं है। ७. अ० २ कृपी, आ० ६ कूंवी राग। ८. अ० २ समरई जिम, आ० ६ समरैरि। ९. आ० २ चाव, आ० ६ चाय।