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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

DevanagariHindipublished315 pages

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  • १०१ - धावन्न छायह¹ घड जे² । उच्छिठ गाल उपाइअ खिल्लक सत्तूर ॥१४०॥ पडासू कठद्दे पहु घरि माहे³ आइ⁴ । चदरद्⁵ भोहइ गिलेसी राह ॥ थन्र पुलिंदा⁶ यनि⁷ गपठ । दूब किम हयरह यथारि कह परि ॥ उलगाराण की गोरठो । थारउ नाउँ⁸ उडीलइ घण⁹ गढ़ धम्मैर ॥१४१॥ १ आ० ६ छायौ । २. आ० २, आ० ६ चद्रमा । यह छंद अ० २ खंड ३ में ५३, आ० ६ पाठ ३ में ५० है । आ० ६ आ० १२ म नहीं दै । लेकिन इसकी यातम पंक्ति अ० २ और आ० ६ में है— “श्रीकी गात (आ० ६ उवाका) उघाड्या ( आ० ६ घर माहे ) जावनजूर ।” ३ आ० ६ भीतर । ४. अ० २ आव आ० १२ आव । ५. आ० ६ चांद कह, आ० १२ चद कै । ६ + ७ आ० ६ फूलतो बनी, आ० १२ पुलिहा दनि । ८ अ० २ राव, आ० ६ राय । ९. अ० २ तु, आ० ६ मैनू यह छंद अ० २ खंड ३ म ७४, आ० ६ रांड ३ में २२, अ० १२ में २८ है। लेकिन अ० २ और आ० ६ म चौथी और पाँचवों पंक्तियाँ हैं— ४ खीर (सना आ० ६) को तोलही (पकूडी आ०६) कु (किहा--आ० ६) रहद संर । ५ घणी थाका घण ताफनइ । आ० १२ म चौथी पक्ति है - “दूब न छुटे मजारह फटि ।”
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