वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextसूत्र २८ ] अध्याय १ ९७ शरीरधारी होनेपर देवताओंको भी जन्म-मरणशील मानना पड़ेगा। ऐसी दशामें वे नित्य नहीं होंगे तथा नित्य वैदिक शब्दोंके साथ उनके नाम- रूपोंका नित्य सम्बन्ध भी नहीं रह सकेगा।' ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये; क्योंकि जहाँ कल्पके आदिमें देवादिकी उत्पत्तिका वर्णन आता है, वहाँ यह बतलाया गया है कि 'किस रूप और ऐश्वर्यवाले देवताका क्या नाम होगा।' इस प्रकार वेदोक्त शब्दसे ही उनके नाम, रूप और ऐश्वर्य आदिकी कल्पना की जाती है अर्थात् पूर्वकल्पमें जितने देवता, जिस- जिस नाम, रूप तथा ऐश्वर्यवाले थे, वर्तमान कल्पमें भी उतने ही देवता वैसे ही नाम, रूप और ऐश्वर्यसे युक्त उत्पन्न किये जाते हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि कल्पान्तरमें देवता आदिके जीव तो बदल जाते हैं, परंतु नाम-रूप पूर्वकल्पके अनुसार ही रहते हैं। यह बात प्रत्यक्ष (श्रुति) और अनुमान (स्मृति)-के प्रमाणसे भी सिद्ध है। श्रुतियों और स्मृतियोंमें उपर्युक्त बातका वर्णन इस प्रकार आता है—'स भूरिति व्याहरत् स भूमिमसृजत' 'स भुवरिति व्याहरत् सोऽन्तरिक्षमसृजत्।' (तै० ब्रा० २।२।४) 'उसने मन-ही-मन 'भूः' का उच्चारण किया, फिर भूमिकी सृष्टि की,' उसने मनमें 'भुवः' का उच्चारण किया, फिर अन्तरिक्षकी सृष्टि की' इत्यादि। इस वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि प्रजापतिने पहले वाचक शब्दका स्मरण करके उसके अर्थभूत स्वरूपका निर्माण किया। इसी प्रकार स्मृतिमें भी कहा है— सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक्। वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे॥ (मनु० १। २१) 'उन सृष्टिकर्ता परमात्माने पहले सृष्टिके प्रारम्भमें सबके नाम और पृथक्-पृथक् कर्म तथा उन सबकी अलग-अलग व्यवस्थाएँ भी वेदोक्त शब्दोंके अनुसार ही बनायीं।' सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनको ही वेदकी नित्यतामें हेतु बतलाते हैं—