वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ अतएव च नित्यत्वम् ॥ १। ३। २९ ॥ अतएव = इसीसे; नित्यत्वम् = वेदकी नित्यता; च = भी (सिद्ध होती है)। व्याख्या—सृष्टिकर्ता परमेश्वर वैदिक शब्दोंके अनुसार ही समस्त जगत्की रचना करते हैं, यह कहा गया है। इससे वेदोंकी नित्यता स्वतःसिद्ध हो जाती है; क्योंकि प्रत्येक कल्पमें परमेश्वरद्वारा वेदोंकी भी नयी रचना की जाती है; यह बात कहीं नहीं कही गयी है। सम्बन्ध—प्रत्येक कल्पमें देवताओंके नाम-रूप बदल जानेके कारण वेदोक्त शब्दोंकी नित्यतामें विरोध कैसे नहीं आयेगा? इस जिज्ञासापर कहते हैं— समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश्च ॥ १। ३। ३० ॥ च = तथा; समाननामरूपत्वात् = (कल्पान्तरमें उत्पन्न होनेवाले देवादिकों- के) नाम-रूप पहलेके ही समान होते हैं, इस कारण; आवृत्तौ = पुनः आवृत्ति होनेपर; अपि = भी; अविरोधः = किसी प्रकारका विरोध नहीं है; दर्शनात् = क्योंकि (श्रुतिमें) ऐसा ही वर्णन देखा गया है; च = और; स्मृतेः = स्मृतिसे भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—वेदमें कहा गया है कि 'सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्व- मकल्पयत्।' (ऋ० १०। १९०। ३) अर्थात् 'जगत्स्रष्टा परमेश्वरने सूर्य, चन्द्रमा आदि सबको पहलेकी भाँति बनाया।' श्वेताश्वतरोपनिषद् (६। १८)- में इस प्रकार वर्णन आता है— यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तँ ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ 'जो परमेश्वर निश्चय ही सृष्टिकालमें सबसे पहले ब्रह्माको उत्पन्न करता है और उन्हें समस्त वेदोंका उपदेश देता है, उस आत्मज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले प्रसिद्ध देव परमेश्वरकी मैं मुमुक्षुभावसे शरण ग्रहण करता हूँ।' इसी प्रकार स्मृतिमें भी कहा गया है कि—