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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

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१०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ वह शोकसे व्याकुल होकर दौड़ा आया था, इसलिये उसे शूद्र* कहा। यही बात उस प्रकरणकी समालोचनासे सिद्ध होती है। छान्दोग्योपनिषद्में (४।१।१ से ४ तक) वह प्रकरण इस प्रकार है— 'राजा जानश्रुति श्रद्धापूर्वक बहुत दान देनेवाला था। वह अतिथियोंके भोजन- के लिये बहुत अधिक अन्न तैयार कराकर रखता था। उनके ठहरनेके लिये उसने बहुत-सी विश्रामशालाएँ भी बनवा रखी थीं। एक दिनकी बात है, राजा जानश्रुति रातके समय अपने महलकी छतपर बैठा था। उसी समय उसके ऊपरसे आकाशमें कुछ हंस उड़ते हुए जा रहे थे। उनमेंसे एक हंसने दूसरेको पुकारकर कहा—'अरे! सावधान, इस राजा जानश्रुतिका महान् तेज आकाशमें फैला हुआ है, कहीं भूलसे उसका स्पर्श न कर लेना, नहीं तो वह तुझे भस्म कर देगा।' यह सुनकर आगे जानेवाले हंसने कहा—अरे भाई! तू किस महत्ताको लेकर इस राजाको इतना महान् मान रहा है, क्या तू इसको गाड़ीवाले रैक्वके समान समझता है?' इसपर पीछेवाले हंसने पूछा— 'रैक्व कैसा है?' अगले हंसने उत्तर दिया—'यह सारी प्रजा जो कुछ भी शुभ कर्म करती है, वह सब उस रैक्वको प्राप्त होता है तथा जिस तत्त्वको रैक्व जानता है, उसे जो कोई भी जान ले, उसकी भी ऐसी ही महिमा हो जाती है।' इस प्रकार हंसोंसे अपनी तुच्छताकी बात सुनकर राजाके मनमें शोक हुआ; फिर वह रैक्वकी खोज कराकर उनके पास विद्याग्रहणके लिये गया। रैक्व- मुनि सर्वज्ञ थे, वे राजाकी मनःस्थितिको जान गये। उन्होंने उसके मनमें जगे हुए ईर्ष्याभावको दूर करके उसमें श्रद्धाका भाव उत्पन्न करनेका विचार किया और अपनी सर्वज्ञता सूचित करके उसे सावधान करते हुए 'शूद्र' कहकर पुकारा। यह जानते हुए भी कि जानश्रुति क्षत्रिय है, रैक्वने उसे 'शूद्र' इसलिये कहा कि वह शोकके वशीभूत होकर दौड़ा आया था। अतः इससे यह नहीं सिद्ध होता कि वेदविद्यामें शूद्रका अधिकार है।

  • शुचम् आद्रवति इति शूद्रः—जो शोकके पीछे दौड़ता है, वह शूद्र है, इस व्युत्पत्तिके अनुसार रैक्वने उसे 'शूद्र' कहा।