वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextसूत्र ३५-३६ ] अध्याय १ १०३ सम्बन्ध— राजा जानश्रुतिका क्षत्रिय होना कैसे सिद्ध होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— क्षत्रियत्वावगतेश्चोत्तरत्र चैत्ररथेन लिंगात् ॥ १ । ३ । ३५ ॥ क्षत्रियत्वावगतेः=जानश्रुतिका क्षत्रिय होना प्रकरणमें आये हुए लक्षणसे जाना जाता है, इससे; च=तथा; उत्तरत्र=बादमें कहे हुए; चैत्ररथेन=चैत्ररथके सम्बन्धसे; लिंगात्=जो क्षत्रियत्वसूचक चिह्न या प्रमाण प्राप्त होता है, उससे भी (उसका क्षत्रिय होना ज्ञात होता है)। व्याख्या—उक्त प्रकरणमें जानश्रुतिको श्रद्धापूर्वक बहुत दान देनेवाला और अतिथियोंके लिये ही तैयार कराकर रखी हुई रसोईसे प्रतिदिन उनका सत्कार करनेवाला बताया गया है। उसके राजोचित ऐश्वर्यका भी वर्णन है, साथ ही यह भी कहा गया है कि राजाकी कन्याको रैक्वने पत्नीरूपमें ग्रहण किया। इन सब बातोंसे यह सिद्ध होता है कि वह शूद्र नहीं, क्षत्रिय था। इसलिये यही सिद्ध होता है कि वेदविद्यामें जाति-शूद्रका अधिकार नहीं है। इसके सिवा, इस प्रसंगके अन्तिम भागमें रैक्वने वायु तथा प्राणको सबका भक्षण करनेवाला कहकर उन दोनोंकी स्तुतिके लिये एक आख्यायिका उपस्थित की है। उसमें ऐसा कहा है कि 'शौनक और अभिप्रतारी चैत्ररथ— इन दोनोंको जब भोजन परोसा जा रहा था, उस समय एक ब्रह्मचारीने भिक्षा माँगी' इत्यादि। इस आख्यायिकामें राजा जानश्रुतिके यहाँ शौनक और चैत्र- रथको भोजन परोसे जानेकी बात कही गयी है, इससे जानश्रुतिका क्षत्रिय होना सिद्ध होता है; क्योंकि शौनक ब्राह्मण और चैत्ररथ क्षत्रिय थे; वे शूद्रके यहाँ भोजन नहीं कर सकते थे। अतः यही सिद्ध होता है कि जाति-शूद्रका वेदविद्यामें अधिकार नहीं है। सम्बन्ध— उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये ही दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— संस्कारपरामर्शात्तदभावाभिलापाच्च ॥ १ । ३ । ३६ ॥ संस्कारपरामर्शात्=श्रुतिमें वेदविद्या ग्रहण करनेके लिये पहले उपनयन